Sunday, October 4, 2015

कहने को पचीस पक्ष है


अरस नाहीं सुमारमें, सो हक ल्याए माहें दिल मोमन।
बेसुमार ल्याए सुमार में, माहें आवने दिल रूहन।।
अरस नाही सुमार में ,

परमधाम का कोई पारावार नही है कहने को पचीस पक्ष है पर जरा खुद ही सोचिये की क्या अनंत ब्रह्म केवल पचीस पक्ष में ही सिमित है पर क्योंकि समझाने के लिए कुछ तो लिखना था इसलिए केवल शब्दों का प्रयोग किया गया जिसमे भाव छुपे है ..

परमधाम का तो एक एक कण भी अनंत है ..यहां एक छोटे से अनुभव के दूारा समझाने का प्रयास किया जा रहा है कृपया शुध्द रूप में ग्रहण करें ..जब आत्माएं परमधाम में किसी कण में दृष्टि डालती है तो वो कण आत्माओं से मोहित हो जाता है क्योंकि वहां परमात्मा के आलावा कुछ भी नही है वहां का कण कण परमात्मा है इसलिए वो कण आत्मवो पे मोहित हो जाता है और आत्माएं भी उस कण पे इतना मोहित हो जाती है की उनकी दृष्टि उसमे समने लगती है इस प्रकार दोनों अरस परस हो जाते है जिस से दोनों का आनंद प्रवाह निरंतर बढ़ने लगता है इसी प्रवाह में आतामांये उस कण से अनंत आंनद अनुभव करने लगतीं है जिसमे उन्हें अपने चारो और अनंत नक्काशिया और लताएँ अनुभव होने लगती है ये सभी चेतन है और इनसे मीठी मीठी ध्वनि निकल कर आत्मावों को इस प्रकार स्पर्श करती है की आत्माऔं के अंगो से भी वही ध्वनि निकने लगती है यह ध्वनी कुछ और नही बल्कि आत्मंवो का बढ़ता हुआ आनंद ही है जो उसी ध्वनी के रूप में आने लगता है दब ये दोनो ध्वनीयां परसपर मिलती हैं तो एक नये आनंद का निर्माण होता है जो पहले से कहीं अधिक होता है जिसको शब्दो में बयां नही किया जा सकता ...फिर यही आनंद की ध्वनि अनेक रंगो में प्रवर्तित होकर चारो तरफ अनेक रंगीन व अनंत मोहक छटायें बना देतीं है जिसमे आत्माये उड़ने लगतीं है वे अनुभव करती है की वे भी इन रंगो का एक हिस्सा है और ये रंग कोई और तत्त्व नही केवल और केवल अनद तत्त्व है इसी के रंग में वे खुद को बहता हुवा पातीं  है इसके बाद भी बहोत आनंद की लीलाएं होती है (आत्मन्वो की आँखे उस कण से अनेक प्रकार से मीठी बातें भी करती हैं क्योंकि वहाँ बोलने के लिए किसी इंद्री की जरूरत नही होती आँखे बोल सकतीं हैं कान देख सकते हैं त्वचा सुन सकती हैं वह हर अंग पूर्ण हैं इसलिए आत्माएँ धाम में हर तरफ दृष्टि रखती हैं हर वस्तु उन्हें दृश्येमान रहती हैं हर चीज से वो बिना बोले भी बात कर लेतीं हैं ) जो अनंन्त है उनका वर्णन करूं तो ऐसे अनेक जीवन बीत जाएँ पर एक कण की व्याख्या संभव नही है  ....इस प्रकार आत्माएं परमधाम के केवल एक कण से इतना आनंद प्राप्त करती है यह तो केवल एक कण है फिर आप अंदाज लगा सकते है की वो धाम अनंत है या सिमित
ऐसे परम धाम के आनंद अनुभव या ज्ञान परमात्मा ने इस संसार में भी आत्मंवो के हृदये में अंकित कर दिया है जिसका आनंद वे निरंतर लेती रहती हैं ,,इस प्रकार परमात्मा अनंत को सिमित में लेकर आय हैं अर्थात इस ब्रह्मांड में जो की सिमित है यहाँ परमधाम के अनंत भाव आत्मवो के हृदये में अंकित कर दिया है और वो भी इसलिए की परमात्मा उनके हृदये में आकर बैठ सके तभी तो आत्मांये परमात्मा को पहचान सकेंगी क्योंकी परमात्मा अनंत के भी अनंत है और जब आतमाऔं के हृदये में अनंत धाम की पहचान हो जाएगी तभी आत्मायें उस अनंत परमात्मा को पहचान सकेंगी ...

प्रणाम जी

Saturday, October 3, 2015

साधक का प्रश्न

साधक का प्रश्न: Hum to choti choti bato se chinta karte h fir shaswat aanand me  Koi kaise rah sakta h??

उत्तर-- विष पीकर कहते हो की दूध का स्वाद नही मिल रहा ये जीव विकारो से बना है और विकार दुःख का कारण है आनंद का नही इसलिए जब तक जीव भाव में रहोगे आनंद कैसे मिलेगा..आनंद का विषय तो आत्मा और परमात्मा है ,,

जिस  प्रकार  मान  प्रतिष्ठा  पाने के  लिए  हम  प्रतिष्ठित  लोगो  का  संग  करते  है  जैसे प्रतिष्ठा के किये लोग नेताओं के संग संग घूमतें है..उसी  प्रकार हमारी आत्मा  सदेव  शास्वत  आनंद  में  रहती  है तो  हमें  भी  आनंद के लिय आत्म  भाव का संग करने  का अभ्यास करना  चाहिए ..जितना आत्म भाव आएगा उतना आनंद आएगा क्योंकि आत्मा आनंद (परमात्मा) का अंश  है और सदेव आनंदित है..

प्रणाम  जी

महत्वपूर्ण विषय

जैसे जैन कैवल्य ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति को तीर्थंकर या अरिहंत कहते हैं। बौद्ध संबुद्ध कहते हैं वैसे ही हिंदू भगवान कहते हैं। भगवान का अर्थ है जितेंद्रिय। इंद्रियों को जीतने वाला। भगवान का अर्थ परमात्मा नहीं और जितने भी भगवान हैं वे परमात्मा कतई नहीं है। परमात्मा सर्वोच्च सत्ता है।

भगवान शब्द संस्कृत के भगवत शब्द से बना है। जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंचतत्वों पर पकड़ है उसे भगवान कहते हैं। भगवान शब्द का स्त्रीलिंग भगवती है। वह व्यक्ति जो पूर्णत: मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर कहीं भी जन्म लेकर कुछ भी करने की क्षमता रखता है वह भगवान है। ट
भगवान को ईश्‍वरतुल्य माना गया है इसीलिए इस शब्द को ईश्वर, परमात्मा या परमेश्वर के रूप में भी उपयोग किया जाता है, लेकिन यह उचित नहीं है।
भगवान शब्द का उपयोग विष्णु और शिव के अवतारों के लिए किया जाता है। दूसरा यह कि जो भी जीव पांचों इंद्रियो और पंचतत्व के जाल से मुक्त हो गया है वही भगवान कहा गया है। इसी तरह जब कोई स्त्री मुक्त होती है तो उसे भगवती कहते हैं। भगवती शब्द का उपयोग माँ दुर्गा के लिए भी किया जाता है। इसे ही भागवत मार्ग कहा गया है।
भगवान (
संस्कृत : भगवत्) सन्धि विच्छेद: भ्+अ+ग्+अ+व्+आ+न्+अ
भ = भूमि
अ = अग्नि
ग = गगन
वा = वायु
न = नीर
भगवान पंच तत्वों से बना/बनाने वाला है।
यह भी जानिए....
भगवान्- ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य- ये गुण अपनी समग्रता में जिस गण में हों उसे 'भग' कहते हैं। उसे अपने में धारण करने से वे भगवान् हैं। यह भी कि उत्पत्ति, प्रलय, प्राणियों के पूर्व व उत्तर जन्म, विद्या और अविद्या को एक साथ जानने वाले को भी भगवान कहते हैं।

वह परब्रह्म (परमात्मा) एकात्म भाव से और एक मन से तीव्र गति वाले हैं। वे सबके आदि (प्रारंभ) तथा सबके जानने वाले हैं। इन परमात्मा को देवगण भी नहीं जान सके। वे अन्य गतिवानों को स्वयं स्थिर रखते हुए भी अतिक्रमण करते हैं। उनकी शक्ति से ही वायु, जल वर्षण आदि क्रियाएँ होती हैं। वे चलते हैं, स्थिर भी हैं; वे दूर से दूर और निकट से निकट हैं। वे इस संपूर्ण विश्‍व के भीतर परिपूर्ण हैं तथा इस विश्‍व के बाहर भी हैं।'

(।।4,5।।-ईशावास्योपनिषद)

अपनें ही हृदय में

याही ठौर रूहें बसत, रात दिन रहें सनकूल।
हक अरस मोमिन दिल, तिन निमख न पडे भूल।।

अपनें ही हृदय में ब्रह्मआत्माएँ रात-दिन आनंद अनुभव करतीं हैं. क्योंकि ब्रह्मआत्माओंका हृदय ही परमात्मा का परमधाम है. इसलिए उनसे लेशमात्र भी भूल नहीं हो सकती है कि वे परमात्मा से दूर हो जाएँ ...

प्रणाम जी

Friday, October 2, 2015

आनंद से आनंद को आनंद ( अरसपरस )

आनंद से आनंद को आनंद ( अरसपरस )

प्यारे कदम राखों छाती मिने, और राखों नैनों पर।
सिर ऊपर लिए फिरों, बैठो दिलको अरस कर।।

हे प्यारे मुझे इस बात से कोई संशय नही की आप मेरे (आत्मा के )हृदये में रहते हो और नित नए अहसास कराते रहते हो आपकी इन आनंद की लीलाओ को मैं प्रत्येक्ष अनुभव करति हूँ इस कारण मेरे आत्म हृदये में भी कुछ लिलावों की इछा उतपन्न हो रही है ...
की आप मेरे हृदये में अपने कदम रखो क्योंकि आप स्वयं आनंद हो आपके हर अंग आनंद से बने है अर्थात आपका हर अंग आनंद ही है तो जब आप अपने आनंद रूपी चरणो से मेरे हृदये में विचरण करोगे तो मेरे आनंद रूपी हृदये में आपके आनंद रूपी चरणों के आनंद चिन्ह स्थायी रूप से अंकित हो जॉएंगे जिनसे मुझे अखंड और निरंतर आनंद मिलता रहेगा आपके चरण चिन्हो का जो मेरे हृदये में स्थायी आनंद अंकित होगा मैं उसे निरंतर प्राप्त  करती रहूंगी..
"और राखों नैनों पर।
सिर ऊपर लिए फिरों, बैठो दिलको अरस कर"
और में चाहती हूँ की आप मेरे नैनो में आकर विराजमान हो जाओ जिस से मेरे नैनो में अखंड आनंद निरंतर  दृश्येमान रहे क्योंकि जब आप  मेरे नैनो में स्थायी रूप से आ जाओगे तो मुझे हर जगह आनंद के अलावा कुछ भी दिखाई नही देगा इस कारण हर पल मुझे आनंद की प्राप्ति होती रहेगी , और मैं आपको सिरोधार्ये करूँ जिस से आप आवरण रूप से मेरे ऊपर हर पल विराजमान रहें हर पल मैं आपके आपसे आपमें ही विचरण करती रहूँ , जब इस प्रकार आपको में अपने अनुभव में ले लुंगी तो आप मेरे हृदये में इस तरह से अनुभव करवाएंगे जैसे आपका हर आनंद मुझे प्राप्त होने लगा और आपका अंग याने आनंद का अंग होने के कारण मेरा आनंद आपमें समाने लगेगा इस कारण मुझमे और आपमें कोई भेद नही रह जायेगा..मुझे यहाँ रहते हुए भी आपसे एकदिली का अनुभव होने लगेगा जिस से हमारा हृदये अरसपरस हो जायेगा इनमे कोई भेद नही रह जायेगा...

प्रणाम जी

Thursday, October 1, 2015

केवल अच्छे कर्मो के द्वारा ही जीवन का कल्याण संभव नहीं है।

सुप्रभात जी

केवल अच्छे कर्मो के द्वारा ही जीवन का कल्याण संभव नहीं है। एक बार प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण बैठे थे। अचानक प्रभु श्रीराम हंस पडे। लक्ष्मण आश्चर्यचकित प्रभु श्रीराम को देखने लगे। लक्ष्मण ने पूछा, भइया ऐसी क्या बात हुई कि आप एकाएक हंस पडे। प्रभु श्रीराम ने कहा कि सामने वह कीडा वृक्ष पर चढने का प्रयास कर रहा है, परंतु बार-बार नीचे गिर जाता है। लक्ष्मण ने पूछा, प्रभु इसमें हंसने वाली बात क्या हुई, कृपया मुझे भी बताइए। तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि लक्ष्मण जिस कीडे को तुम देख रहे हो इसमें जो चेतन शक्ति है अर्थात यह जीवात्मा, अठारह बार स्वर्ग के राजा इंद्र की गद्दी पर बैठ चुका है। इसके बाद भी यह चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। जब मानव रूप में जन्म मिला, अच्छे कर्म किए, अश्वमेघ यज्ञ किए, स्वर्ग के राजा इंद्र की गद्दी मिल गई। सुख ऐश्वर्य भोगा। इसके बाद फिर चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मानव तन, फिर इंद्र की गद्दी और इसके बाद अब पुन: चौरासी लाख योनियों में ही भटक रहा है। यहां हमें यह संकेत मिलता है कि केवल अच्छे कर्मो से ही कल्याण संभव नहीं है।

जब अपने अंदर के चेतन परमात्मा मे स्थित हो जाओगे तब करने कराने वाले परमातमा हो जायेंगे तब तुम कर्म बन्धन से मुक्त होकर परमात्मा को पराप्त हो जाओगे ..यही आनंद पराप्ति हमारा परम लक्षय है...

अष्टावक्र कहते हैं - तुम्हारा किसी से भी संयोग नहीं है, तुम शुद्ध हो, तुम क्या त्यागना चाहते हो, इस (अवास्तविक) सम्मिलन को समाप्त कर के ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो॥

प्रणाम जी

बातूनी भेद


ए जो अरवाहें अरस की, पडी रहें तले कदम।
खान पान इनों इतहीं, रूहें रहें तले हुकम।।

ये जो आनंद की अंश आत्माएँ हैं जो जानती हैं की आनंद कहीं बाहर नही है वो अपने हृदये में ही आनंद रूपी चेतन ब्रह्म को पा लेतीं हैं इन्ही को परमधाम की आत्माएँ कहा जाता है , ये अपने हृदये में ही परमात्मा का चिंतन व अनुभव निरंतर करती रहती है इसी को परमात्मा के चरणो में पड़ा रहना कहा गया है अन्यथा चरणों में पड़े रहने का  भाव दूेत भाव है क्योंकि चरणो में बड़ो के छोटे पड़ते है और जहां बड़े छोटे का भाव हो वह परमात्मा का शुद्ध प्रेम नही हो सकता क्योंकि प्रेम का भाव ही अदूेत से प्रारम्भ होता है जहाँ दूेत हो वो प्रेम नही आक्रषण होता है प्रेम में मैं और तू का भाव नही रहता जब निरंतर चिंतन से भावप्रवाह उसी तरफ हो जाता है तो मैं तू हो जाता है जब प्रेम जागृत होता है इसलिए इसमें चरणो में पड़े रहने का भाव मात्र समझाने के लिए बताया गया है , "खान पान इन्हो इत ही " का भाव भी बोहोत गहरा होकर गुरता है खान पान इनों इतहीं,
खान पान से भाव आहार से है..यहाँ आहार का भाव समझना आवशयक है कोई भी वस्तु अपनी सम जाती आहार  से तृप्त होती है जैसे हमारा शरीर पृथ्वी तत्व से बना है तो इसकी तृप्ति भी पृथ्वी तत्त्व आहार से होती है जैसे फल दूध रोटी आदि सब पृथ्वी तत्व से बने है इसी प्रकार हम यानि आत्माएँ आनंद रूपी ब्रह्म की अंशी हैं आनंद ही ब्रह्म है वही हमारे सजातीय हैं इसलिए आत्मावों का आहार अर्थात जिस से उन्हें तृप्ति होती है वो केवल ब्रह्म ही है आत्मावों का इसके अलावा कोई आहार नही है इस आनंद से आनंद की तृप्ति को ही आत्मावों का खान पान कहा गया है , और जब रूहें आनंद रूपी ब्रह्म से एक रूप हो जाती है तो उनमे और ब्रह्म में कोई फर्क या अंतर नही रह जाता उनके हृदये में परमात्मा उनसे एक रूप हो जाते है ऐसी स्थिति में परमात्मा का प्रवाह आत्मा में व आत्मा का परमात्मा में हो जाता है ऐसी स्थिति में जो परमात्मा चाहते है वही आत्माएँ करतीं हैं व जो आत्माएँ करती है वही परमात्मा चाहते है (करता जीव है जो आतम भाव मे आजाता है) इसे ही हुकुम से चलना कहा गया है..

(साथजी वाणी की एक एक चौपाई अन्नत बातुनी रहस्य लिय हुय है जो केवल बृह्मआतमांये ही जान्ती हैं और अन्नत की व्याख्या असंभव है )
इसलिय काहा गया है "ऐ सतवाणी मथके लेऊं जो इसको सार"....

प्रणाम जी