Thursday, February 4, 2016

सुप्रभात जी

हे साधुजन ! सर्व प्रथम स्वयं (आत्मा) को पहचानो, क्योंकि स्वयंको पहचाने बिना कौन कह सकता है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको पहचान लिया है.
यदि शरीर छोडनेके पश्चात् अपने (आत्माके) मूल घरको ढूँढने लगोगे, तब किस स्थानमें ठहर पाओगे ? क्योंकि जब तक आत्मा अपने मूल घरको प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक भ्रममें पड.कर भवसागरमें ही भटकती रहती है.पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचों तत्त्वोंको मिलाकर इस नश्वर ब्रह्माण्डरूपी महलकी रचना की गई है.
हे साधुजन ! अज्ञाानरूपी निद्राको दूर कर जब स्वयंको पहचानोगे, तब ज्ञाात होगा कि इस ब्रह्माण्डरूपी महलकी रचना किस प्रकार हुई है ? तब तुम्हें स्वयं अपने मूल घर परमधामकी प्राप्ति (अनुभूति) हो जाएगी तथा पूर्णब्रह्म परमात्मा के दर्शन भी होंगे...

प्रणाम जी

Wednesday, February 3, 2016

सुप्रभात जी

जिसे अपने भीतर बैठे परमात्मा का पता चल जाता है वह तो आनंदित हो जाता है , उसे तो मिल गया आनंद।  अब उसे कुछ बचा नहीं पाने को। अब कोई धन धन नहीं है; धन तो उसे मिल गया, परम धन मिल गया। और परम धन को पा कर फिर कोई धन के पीछे दौड़ेगा?

जब हम छोटे थे तो हम  खेल—खिलौनों से खेलते थे, जब खिलौना टूट जाता खिलौना तो रोते भी थे; कोई छीन लेता तो झगड़ते भी थे। फिर एक दिन तुम युवा हो गये। फिर हम भूल ही गये वे खेल—खिलौने कहां गये, किस कोने में पड़े—पड़े धीरे से झाड़ कर, बुहार कर कचरे में फेंक दिये गये। हमें उनकी याद भी नहीं रही। एक दिन हम लड़ते थे। एक दिन हम उनके लिए मरने—मारने को तैयार हो जाते थे। आज हमसे कोई पूछे कि कहां गये वे खेल—खिलौने,  हम कहेंगे, अब मैं बच्चा तो नहीं, अब मैं युवा हो गया, प्रौढ़ हो गया; मैंने जान लिया कि खेल—खिलौने खेल—खिलौने हैं।
ऐसी ही एक प्रौढ़ता फिर घटती है, जब किसी को भीतर के परमात्मा का बोध होता है। तब संसार के सब खेल—खिलौने धन—पद—प्रतिष्ठा सब ऐसे ही व्यर्थ हो जाते हैं जैसे बचपन के खेल—खिलौने व्‍यर्थ हो गए। फिर उनके लिए कोई संघर्ष नहीं रह जाता, प्रतिद्वंद्विता नहीं रह जाती, कोई स्पर्धा नहीं रह जाती...यही बोध है परमात्मा का जब ये हो जायगा तो सब अपने आप छूट जायगा..

प्रणाम जी

माया के इन परपंचो से सावधान

माया के सात्विक रूपो से सावधान..

श्रद्धातत्व अविनाशी है । अतः उन साधकों के अविनाशी सिद्धान्तों तथा वचनों पर ही श्रद्धा होनी चाहिए न कि विनाशी देह या नाम में । नाशवान् शरीर तथा नाम में तो मोह होता है, श्रद्धा नहीं । परन्तु जब मोह ही श्रद्धा का रूप धारण कर लेता है तभी ये अनर्थ होते हैं । अतः परमात्मा के शाश्वत, दिव्य, अलौकिक तथा उनके अविनाशी रूप की स्मृति को छोड़ कर इन नाशवान् शरीरों तथा नामों को महत्व देने से न केवल अपना जीवन ही निरर्थक होता है, प्रत्युत् अपने साथ महान् धोखा भी होता है इसलिय माहापूरूषो के शरीरो मे मोह न रख कर उनके मार्ग का अनसरण करना चाहिय..
जो चित्रो को सतसंग मान्ते है वे ध्यान दें..
माया का एक और सात्विक रूप है चित्रो मे मोह रखना ..वास्तव में यह शरीर प्रतिक्षण ही मर रहा है, मुर्दा बन रहा है । इसमें जो वास्तविक तत्व (चेतन) है, उसका चित्र तो लिया ही नहीं जा सकता । चित्र लिया जाता है तो उस शरीर का, जो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है । इसलिए चित्र लेने के बाद शरीर भी वैसा नहीं रहता, जैसा चित्र लेते समय था । इसलिए चित्र की पूजा तो असत् (‘नहीं’)- की ही पूजा हुई । चित्र में चित्रित शरीर निष्प्राण रहता है, अतः हाड़-मांसमय अपवित्र शरीर का चित्र तो मुर्दे का भी मुर्दा हुआ..अगर हम चित्रो को सत्य मान्ते हैं तो हमें माया को झूठ कहने का कोइ अधिकार नही है, नही तो ये वैसा ही होगा की हम विष में से कूछ विष लेके कह रहे हों की ये अमृत है बाकी सब विष है ..इसलिय माया के इन परपंचो से सावधान होकर शुद्ध सत्य को ग्रहण करो..

प्रणाम जी

Tuesday, February 2, 2016

समाधि

सुप्रभात जी

समाधि का अर्थ है चित्त जिसका ध्यान कर रहा हो उस समय चित्त का अपना स्वरुप शून्य होकर केवल ध्येय की ही प्रतीति होना. योग के सन्दर्भ में समाधि का अर्थ है कि चित्त जब परमात्मा का ध्यान कर रहा हो उस समय चित्त का अपना स्वरुप शून्य होकर केवल परमात्मा का ही अनुभव होता है अर्थात आत्मा और परमात्मा की एकरूपता का बोध होना ही समाधि है. ऐसा अनुभव होने के बाद समाधि से जागने पर भी वह सर्वत्र परमात्मा का ही दर्शन करता है.  ऐसा समाधि में स्थित वह परमात्मा की पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है अर्थात परमात्मा जो, जैसा और जितना है ठीक वैसा का वैसा तत्त्व से जान लेता है और इस प्रकार तत्त्व से जानकर तत्काल परमात्मा में प्रविष्ट हो जाता है.

प्रणाम जी

परमतत्व बोध

नाम रूपादिकाः सर्वे मिथ्या सर्वेषु विभ्रमः ।
अज्ञान मोहिता मूढ़ा यावत्तत्त्वं न विद्यते ॥
(शिव स्वरोदय २६)
जब तक परमतत्त्वबोध नहीं हो जाता तब तक नाम-रूप आदि सभी भ्रम मिथ्या हैं और अज्ञान जनित मूढ़ता भी तभी तक है |

जब तक तुम्हे परम तत्व याने अवतारवाद से परे परमात्मा के मूलतत्व और उनसे आत्मा के एकत्व भाव का बोध नही हो जाता तब तक परमात्मा के नाम के भ्रम में ही उल्झे रहोगे ..मन में दूैतभाव प्रबल रूप से अपना खेल करता रहेगा तुम भ्रमित होकर उसके नाम विषेश के जाप मे ही समय व्यतीत कर के संतुष्ट होते रहोगे और मन से रूप बनाकर या ग्रन्थो में दिय शब्द रूप को ही सत्य मान कर उस असत्य का ही ध्यान करोगे और कालआंतर तक दुैतभाव के खेल को ही सत्य मान्ते रहोगे..इसलिय परमात्मा के मूलतत्व और उसके आत्मा से सत्य एकत्व का बोध होना आवश्यक जो किसी के भी बताने से नही अपितु उनकी मेहर से खुद की खोज व उनसे मूल संबंध जानकर ही सम्भव है..

प्रणाम जी

Monday, February 1, 2016

सुप्रभात जी

संसार के सुख और भोग बादलों में कौंधने वाली विद्युत के समान अस्थिर हैं । जीवन हवा के झरोकों से लहलहाते कमल के पत्तों पर तैरने वाली पानी की बूँद के समान क्षणभंगुर है । जीवन की उमंगें और वासनाएँ भी अस्थायी हैं । बुद्धिमान को चाहिए कि इन सब बातों को समझकर अपने मन को स्थिरता और धैर्य के साथ ब्रह्मचिन्तन में लगाये । संसार के नाना प्रकार के सुख भोग क्षणभंगुर हैं और साथ ही संसार में आवागमन के कारण हैं । इस संसार का कोई भी सुख स्थिर नहीं है , अतः सुख के लिए मारे मारे फिरना व्यर्थ है । भोगों का संग्रह बंद करो और अपने आशा रूपी बन्धनों के त्याग से निर्मल हुए मन को अपने आत्म स्वरूप में और परब्रह्म में स्थिर करो । भोगों की ओर से मन को हटाकर परब्रह्म में लगाना ही सर्वोतम कार्य है ..

प्रणाम जी

वाणी

कोट सेवक करो नाम निकालो , इस्ट चलाओ बडाई |
सेवा कराओ सतगुरु केहेलाओ , पर अलख न देवे लखाई ||

चाहे संसार में करोड़ो सेवक या शिष्य बना लो या अपना नाम परिवर्तित कर के कोई भी धर्म सम्बन्धी या किसी भी भगवान के नाम पे रख लो {आमतोर पे देखा गया है की साधू के वेश धारण करने के बाद उनके गुरु उनका नाम परिवर्तित करके धर्म सम्बन्धी  नाम रख देते हैं }चाहे अपने नाम या या अपने मन से नाम रख कर अनेक पन्थ या सम्प्रदायों का निर्माण क्र लो , पर इसका अर्थ ये बिलकुल मत समझ लेना की ऐसा करने से तुम्हे परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी या तुम परमात्मा के मार्ग पे चल पड़े हो या तुम्हे परमात्मा का मार्ग मिल गया है और तुम्हे इस के अपना लक्षे मिल जायेगा , चाहे तुम सतगुरु बन कर जीवन भर अपने शिष्यों से अपनी सेवा करवाते रहो पर इन सब कार्यो से तुम्हे परमात्मा का बोध नही होगा क्योंकि ये सब तो तुम्हारे कर्म है जो तुम्हारे कर्म जाल में कुछ धागे और बन देते है , ये तुम्हारे शरीर सम्बन्धित  कार्य हैं कोई मार्ग नही है, कोई साधन नही है , इनसे आत्मबोध नही होगा , हो भी नही सकता जब तक इन सबसे पार पाके अंतर में खोज नही करोगे परमात्मा रूपी आनंद की प्राप्ति नही हो सकती ..इसलिए ये मान गुमान और अपने दुआरा  बनाये गये ये झूठे ज्ञान का तुम अति सीघ्र उसी प्रकार त्याग करदो जिस प्रकार फल पकने के बाद अपने पेड़
को त्याग देता है और केवल शुद्ध सत्ये के मार्ग को अपनाओ जिस से तुम्हे शुद्ध सत्ये आनंद की प्राप्ति हो सके ....

प्रणाम जी