Sunday, March 6, 2016

सुप्रभात जी

हे मेरी आत्मा ! पल भर में ही लीन हो जाने वाले इस संसार रूपी नाटक को तू सावधानी से देख। इस सम्बन्ध में अब तू क्या सोच रही है ? परमात्मा को पाने के लिये तुम एक पल के चौथाई हिस्से में ही इस ब्रह्माण्ड और निराकार को पार कर लो।   निराकार से परे उस अनन्त आनंद रूपी परमधाम में परमात्मा विराजमान हैं। वहां तक पहुंचने के मार्ग में अब कोई भी बाधा नहीं है। तू तो बिना पैरों के ही अपनी मंजिल पूरी कर लेगी अर्थात् नवधा भक्ति और कर्मकाण्ड की राह छोड़कर इश्क-ईमान के पंखों से पक्षी की भांती उड कर उस आनंद तक पहुंच जायेगी।  परमधाम कोई सथान विशेष नही है अपितू अपने परमातमा तत्व का ही अन्नत विस्तार रूप में अन्नत प्रेम और आनन्द का स्थान है। वहां के त्रिगुणातीत अनन्त सुख को शब्दों में कैसे कहा जाये ? वहां के सुख की अनुभूति होते ही माया की सारी इच्छायें समाप्त हो जाती हैं वो भी याहां रहते रहते इसी को मनिषी लोग भगवत प्राप्ति कहते हैं।

प्रणाम जी
गहनता से लें...


हक कदम हक अरसमें, सो अरस मोमिन दिल।
छूटे ना अरस कदम, जो याहीं की होए मिसल।।

परमात्मा की उपस्थिती केवल परमात्मा तत्वी ही होती है जो पूर्ण आनंद से भी पूर्ण सदा से व अन्नत है यही पूर्ण व अन्नत सभी आत्माओं का हृदय है, सब में यही हृदय है ,इसलिय सब वाहेदत मे हैं अर्थात सबमे एकदिली है..यही परमधाम हैं. इसलिय सब ब्रह्मआत्माओंका हृदय परमधाम कहा गया है. इसलिए जो परमधामकी आत्माऐं होंगी उनके हृदय से परमात्मा के चरणकमल याने उन की उपस्थिती क्षणमात्रके लिए भी नहीं छुटेगी छूट भी कैसे सकती है ज़रा वाहेदत के भाव को समझोगे तो विषय अपने आप समझ आ जायगा..

प्रणाम जी

Saturday, March 5, 2016

सुप्रभात जी

अगर कर्म बंधन की बात करें तो इन दो समझना होगा..
जीव और प्रकृति -
जीव में कभी परिवर्तन नहीं होता , जबकि प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती |

जब यह जीव प्रकृति के साथ संबंध जोड़ लेता हैं, तब प्रकृति की क्रिया जीव का " कर्म " बन जाती हैं |
क्योंकि प्रकृति के साथ संबंध मानने से तादात्म्य(अभिन्नता,एकरसता) हो जाता हैं | तादात्म्य होने से जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त है,उनमें ममता होती हैं और उस ममता के कारण अन्य अप्राप्त वस्तुओं की कामना होती है |

इस प्रकार जब तक कामना, ममता और तादात्म्य रहता हैं, तब तक परिवर्तन रुप क्रिया होती हैं , उसका नाम " कर्म " है |
(इस से कर्म फल-जनकता रहती है |)

तादात्म्य  (अभिन्नता,एकरसता) टूटने पर वही कर्म जीव के लिए "अकर्म " हो जाता है अर्थात वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है, उसमें फलजनकता नही रहती अतः यह ' कर्म में अकर्म ' है |

अकर्म - अवस्था में अर्थात स्वरुप का अनुभव होने पर उस महापुरुष के शरीर से जो क्रिया होती रहती है,
वह " अकर्म में कर्म " है |

श्री कृष्ण जी ने गीता में उपदेश दिया है
" कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः |
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत || " (गीता ४|१८)

भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म (संसार को सवप्न की भांती देखकर इसमें अलिप्ता) देखता है और जो मनुष्य अकर्म में कर्म ( जीव को कर्ता न समझकर प्रकृति को कर्ता) देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह मनुष्य समस्त कर्मों को करते हुये भी सांसारिक कर्मफ़लों से मुक्त रहता है। more satsang click👇🏼
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प्रणाम जी

Friday, March 4, 2016

वाणी

कोई बुरा न चाहे आप को, पर तिन से दूसरी न होए |
बीज बराबर वृख है, फल भी अपना सोये ||

माया को चाहने वाले , बंदगी से परमात्मा को प्राप्त करने वाले और परमात्मा में एक रस होने वाले इनमे से कोई भी अपना बुरा नही चाहता पर सबकी साधना या आनंद प्राप्ति का एक स्तर है सब अपने स्तर तक ही आनंद प्राप्त कर सकते है, इसलिए अगर किसी को बोहोत समझाने पर भी अगर वो उस स्तर तक नही पोहोच पाता जहाँ आप उसे पोहोचना चाहते है तो इसका अर्थ है की उसका स्तर इतना ही है सामान्यत: जीव अपने संस्कारो  में ही उलझा रहता है जो उसने अनंत जन्मों में देखा है वो शब्द जाल उसके सामने आते ही वो उसी को सत्ये मानने लगता है जैसे जीव को मनुष्ये के गुण ही कहीं मिल जाएँ तो बस वो उसी को परमात्मा मान लेता है उनके के लिए मनुष्ये में मनुष्ये के गुण होतो बस मिल गया परमात्मा साधारणत: उनके सत्संगों में भी यही होता है की "किसी का दिल मत दुखाओ तो बस हो गया भजन" ये बात कोई बुरी नही है क्योंकि ये तो गुण है
और ये भी तभी मिलते है जब सत्ये का उजाला होता है अँधेरे में रह कर प्रकाश प्रकाश सुन्दर शब्दों में बोलने से प्रकाश नही होता उसके लिए दीपक जलाना पड़ेगा, कई मेरे मित्र शिष्टाचार और विनम्रता से ही साधना का आंकलन करते हैं मेने देखा है कई मेरे मित्र तीन गुणों से ही साधक को तोलने में जीवन बिता देते है पर परमात्मा तो गुणातीत है और सर्वोच साधक का व्यव्हार भी गुणातीत होता है इसलिए सबकी साधना
का एक अलग  स्तर है और उनको आनंद प्राप्ति भी अपने स्तर के अनुसार ही होती है, इसलिए किसी को केवल उतना ही बताया जा सकता है जितना की उसका स्तर होता है |
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प्रणाम जी

Thursday, March 3, 2016

सुप्रभात जी

पुस्तकीय ज्ञान दूसरों का ज्ञान है तुम्हारा अपना नहीं . ज्ञान तो स्वयं की अनुभूति का नाम है. देह मिली है जिसका अर्थ है प्रारब्ध और वासनाओं का व्यापार अभी शेष है . देह के सभी आवरण केवल भ्रांति हैं और भ्रांति का नाश केवल बोध से होता है . जो कुछ भी परिवर्तन शील है केवल भ्रांति हैं जिसने आत्मा को जान लिया, उसका संसार स्वयं छूट जाता है ,संसार छोड़ने से आत्म ज्ञान नहीं होता है, संन्यास लेना या देना जैसा कुछ भी नहीं होता हैं, यह विरक्ति और त्याग की ,मन की अवस्थाएँ हैं , अतः सन्यास कार्य नहीं अनुभूति है।

प्रणाम जी

Tuesday, March 1, 2016

सुप्रभात जी

आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना अध्यात्म का आरम्भ है। उसके संरक्षण में चलते हुए परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। यही अध्यात्म की पराकाष्ठा है। इसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ है अज्ञान है..
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प्रणाम जी
बुध तुरिया दृष्ट श्रवना , जेती गम वचन ।

उतपन सब होसी फना , जो लो पोहोंचे मन ।।   (श्रीमुख वाणी- कि. २७/१६)

बुद्धि, चित्त, मन, दृष्टि, श्रवण और वाणी की पहुँच से वह परब्रह्म परमात्मा सर्वथा परे हैं । यह उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नश्वर अर्थात परिवर्तनशील है । इसलिए यहाँ की किसी भी वस्तु से उस परम तत्व को कहा नहीं जा सकता है ।  ना ही उसकी व्याख्या की जा सकती है...इसलिय इस नशवर को माध्यम बनाना व्यर्थ है. तो फिर वो मिले कैसे ?
केवल यह चेतन जीव अपने स्वरूप को जानकर शुद्ध चेतन आत्मा के माध्यम से परमात्मा को जान सकता है..इसमें गहन रूप में परमात्मा की कृपा छिपी रहती है..
इसलिय उस परमात्मा को इस ब्रह्माण्ड की किसी भी बाह्य नश्वर या परिवर्तनशील वस्तु से नही जाना जा सकता..चाहे वह मूर्ती हो, मंदिर हो, किसी संत का समारक हो, किसी धार्मिक स्थान की परिक्रमा या अन्य कोई भी बाह्य साधन हो..

प्रणाम जी