Thursday, June 9, 2016

सुप्रभात जी

हे साधुजन सत्यग्यान का अवतरण हो चुका है तुम भी उसे पाकर ग्यानमय हे जाओ...
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‘बुद्ध’ बौद्ध धर्म की भाषा में सत्य ग्यान देने वाले होते हैं। गौतम बुद्ध ने अपने मृत्यु के समय अपने प्रिय शिष्य आनन्दा से कहा था कि ‘‘नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूं और न तो अंतिम बुद्ध हूं। इस जगत् में सत्य और परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। यह पवित्र अन्तःकरणवाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा। ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न तथा समस्त लोगों का नायक (स्वामी)होगा। जिस प्रकार मैंने संसार को अनश्वर सत्य की शिक्षा प्रदान की, उसी प्रकार वह भी विश्व को सत्य की शिक्षा देगा। विश्व को वह ऐसा जीवन-मार्ग दिखाएगा जो शुद्ध तथा पूर्ण भी होगा। नन्दा! उसका नाम मैत्रेय होगा। (Gospel of Buddha, by Carus, P-217)

*बुद्ध का अर्थ ‘बुद्धि से युक्त’ होता है*।
*मैत्रेय का अर्थ 'दया से युक्‍त' होता है*।

*अब जरा अन्य धर्म ग्रन्थो से इस के प्रमाण जान्ते हैं..* 👇🏼👇🏼

धर्मग्रन्थों की भविष्यवाणियाँ

*बुद्ध गीता*

वाराह कल्प के अट्ठाइसवें कलियुग के प्रारम्भ में ही श्री बुद्ध जी का यह स्वरूप प्रकट होगा । तब सर्वत्र ही अपने और पराये का यह भेद नहीं हो सकता है ।।१२।।

वह बुद्ध जी ही अपने दूसरे तन के स्वरूप में 'कल्कि' नाम से कहलायेंगे (बुद्ध जी का पहला तन श्री देवचन्द्र जी तथा दूसरा तन श्री मिहिरराज जी) । वह ही आदि नारायण को भी अखण्ड धाम का सर्वोच्च ज्ञान देने वाले होंगे ।।२३।।

संसार के सभी धर्मग्रन्थ रूपी लाखों जिह्वायें होते हुए भी (मर्मज्ञ होते हुए भी) सबके आश्रय स्वरूप वह बुद्ध जी तुतली (बोलचाल की सामान्य) भाषा में अपना ज्ञान (तारतम) देने वाले होंगे ।।२८।।

जब यवनों (मुसलमानों) के द्वारा मन्दिरों को गिराया जाने लगेगा तथा तीर्थों की महिमा भी कम होती जायेगी, तब श्री बुद्ध जी का प्रकटन होगा ।।३४।।

*बुद्ध सत्रोत*

कलियुग के प्रथम चरण में वह सच्चिदानन्द परब्रह्म अचानक ही ज्ञान रूप से प्रकट होंगे, जिनके ज्ञान को प्राप्त करके तुम स्वयं भी ज्ञानमयी हो जाना ।।५।।

*पुराण संहिता*

अज्ञानता के अगाध सागर में आत्मांओ के गिर जाने पर परब्रह्म स्वयं अपने कृपा रूपी महासागर में स्नान करायेंगे अर्थात् स्वयं प्रकट होकर अपने अलौकिक ज्ञान से उन्हें जाग्रत करेंगे । (३१/५०)

परमधाम की आत्मायें सुन्दरी और इन्दिरा (श्यामा जी और इन्द्रावती जी) जिन दो तनों में प्रकट होंगी, उनके नाम चन्द्र और सूर्य (देवचन्द्र और मिहिरराज) होंगे । तथा इनके अन्दर साक्षात् परब्रह्म विराजमान होकर लीला करेंगे, जिससे माया के अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश हो जाएगा । (३१/५२-७० का सारांश)

इस प्रकार अपने प्रियतम(परमात्मा) के द्वारा जाग्रत की हुई सभी सखियों (आत्माओं)में से कोई सुन्दरी(सुंदरबाई या देवचन्दर)नामक भाग्यशालिनी सखी सबको जाग्रत करेगी । (३३/१५५)

वह सुन्दरबाई इन्दिरा की सहायता प्राप्त करके जागनी करेगी । सुन्दरी के मन में साक्षात् स्वामिनीजी की ही सुरता प्रवेश करेगी । इस प्रकार इस जागनी के मार्ग में सुन्दरी को ही सदगुरु माना गया है । (३४/४३,४९)

*बृहद्सदाशिव संहिता*

परब्रह्म की आनन्द स्वरूपा जो सखियां ब्रज और वृंदावन में स्थित थीं, वे कलियुग में पुनः प्रकट होंगी और जाग्रत होकर पुनः अपने उस धाम में जायेंगी । (श्रुति रहस्य १७)

चिदघन स्वरूप परब्रह्म के आवेश से युक्त अक्षर ब्रह्म की बुद्धि अक्षरातीत की प्रियाओं (आत्माओं)को जाग्रत करने के लिए तथा सम्पूर्ण लोकों को मुक्ति देने के लिए भारतवर्ष में प्रकट होगी । वह प्रियतम(परमात्मा) के द्वारा स्वामिनी (श्री श्यामा जी) के हृदय में स्थापित किए जाने पर चारों ओर फैलेगी । *(श्रुति रहस्य १८,१९)*


*श्रीमद्भागवत्*

शान्तनु के भाई देवापि तथा इक्ष्वाकु वंशीय राजा मरु इस समय कलाप ग्राम में स्थित हैं । वे दोनो महान योगबल से युक्त हैं । परमात्मा की प्रेरणा से वे दोनो कलियुग में पहले की ही भांति धर्म की स्थापना करेंगे । (१२/२/३७,३८)

भावार्थ- उपरोक्त तीनों ग्रन्थ एक दिशा में ही संकेत कर रहे हैं । परमयोगी देवापि के जीव ने श्री देवचन्द्र (चन्द्र) के रूप में जन्म लिया । उनके अन्दर परमधाम की श्री श्यामा जी (सुन्दरी) की आत्मा ने प्रवेश किया । अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के साक्षात्कार के पश्चात् उन्होंने आत्माओं की जागृति के लिए प्रयास किया।

परमयोगी राजा मरु के जीव ने श्री मिहिरराज (सूर्य) के रूप में जन्म लिया । उनके अन्दर परमधाम की श्री इन्द्रावती जी (इन्दिरा) की आत्मा ने प्रवेश किया । सम्वत् १७३५ में हरिद्वार में सर्वसम्मति से हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों के आचार्यों ने उन्हें 'विजयाभिनन्द निष्कलंक बुद्ध' माना । इस प्रकार परब्रह्म अक्षरातीत ने अपना नाम व सारी शोभा श्री इन्द्रावती जी को दे दी ।

*भविष्योत्तर पुराण*

ब्रह्मा जी ने कहा- हे नारद ! भयंकर कलियुग के आने पर मनुष्य का आचरण दुष्ट हो जाएगा और योगी भी दुष्ट चित्त वाले होंगे । संसार में परस्पर विरोध फैल जायेगा । द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) दुष्ट कर्म करने वाले होंगे और विशेषकर राजाओं में चरित्रहीनता आ जायेगी । देश-देश और गांव-गांव में कष्ट बढ़ जायेंगे । साधू लोग दुःखी होंगे । अपने धर्म को छोड़कर लोग दूसरे धर्म का आश्रय लेंगे । देवताओं का देवत्व भी नष्ट हो जायेगा और उनका आशीर्वाद भी नहीं रहेगा । मनुष्यों की बुद्धि धर्म से विपरीत हो जायेगी और पृथ्वी पर म्लेच्छों के राज्य का विस्तार हो जायेगा ।

जब हिन्दू तथा मुसलमानों में परस्पर विरोध होगा और औरंगज़ेब का राज्य होगा, तब विक्रम सम्वत् १७३८ का समय होगा । उस समय अक्षर ब्रह्म से भी परे सच्चिदानन्द परब्रह्म की शक्ति भारतवर्ष में इन्द्रावती आत्मा के अन्दर विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक स्वरूप में प्रकट होगी । वह चित्रकूट के रमणीय वन के क्षेत्र (पद्मावतीपुरी पन्ना) में प्रकट होंगे । वे वर्णाश्रम धर्म (निजानन्द) की रक्षा तथा मंदिरों *(अर्थात सबके हृदय में परमात्मा)*की स्थापना कर संसार को प्रसन्न करेंगे । वे सबकी आत्मा, विश्व ज्योति पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं । म्लेच्छों का नाश करने वाले बुद्ध ही होंगे और श्री विजयाभिनन्द नाम से संसार में प्रसिद्ध होंगे । *(उ.ख.अ. ७२ ब्रह्म प्र.)*

वह परब्रह्म पुरुष निष्कलंक दिव्य घोड़े पर (श्री इन्द्रावती जी की आत्मा पर) बैठकर, निज बुद्धि की ज्ञान रूपी तलवार से इश्क बन्दगी रूपी कवच और सत्य रूपी ढाल से युक्त होकर, अज्ञान रूपी म्लेच्छों के अहंकार को मारकर सबको जागृत बुद्धि का ज्ञान देकर अखण्ड करेंगे । *(प्र. ३ ब. २६ श्लोक १)*

*माहेश्वरतन्त्रम्*

द्वापर के अन्त होने पर कलियुग में लीला के आविर्भाव होने से, परब्रह्म अपनी प्रियाओं (आत्माओं) की दुखपूर्ण लीला को न सहते हुए, उनमें से एक परम सौभाग्यशालिनी सुन्दरी नाम की प्रिया को निर्णय बतलाकर प्रबोधित करेंगे । (२२/२७,२८)

*सिख पंथ के 'पुरातन सौ साखी' (भविष्य की साखियां) ग्रन्थ का पृष्ठ ६५-६६* 👇🏼

नेह कलंक होय उतरसी , महाबली अवतार । संत रक्षा जुग जुग करे , दुष्टा करे संहार ।।    नवां धरम चलावसी , जग में होवन हार । नानक कलजुग तारसी , कीर्तन नाम *(नाम का अर्थ परबृह्म की पहचान है)*आधार ।।

*सुन्दरी तन्त्र*

पद्मावती और केन नदी के मध्य विन्धयाचल पर्वत के एक क्षेत्र में इन्द्रावती नामक परब्रह्म की आत्मा होगी । उनके अन्दर परब्रह्म सच्चिदानन्द विराजमान होकर पूर्ण ब्रह्म कहलायेंगे ।
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*प्रणाम जी*

Wednesday, June 8, 2016

कलाम अल्ला या हदीसें, सास्त्र पुरान या वेद।
एकसब सुख लेवें मोमिन, हक रसना के भेद।।
(सिंधी, 16-19)

हिन्दु और मुसलमान दोनो के परमात्मा एक ही हैं.
मात्र भाषा भेद के कारण परमात्मा में भेद हो गया..

न काष्ठे विधते देवा न पाषाणे न म्रणमये| भावे हि विधते देवस्तस्माद भावो हि कारणम|| (गरुण पुराण – धर्मकाण्ड – प्रेतखण्ड 38:13)
वह देव ना तो लकड़ी मे, न पत्थर मे, ना मिट्टी मे हैं| वे तो भाव मे विधमान हैं| जहा भाव करे वहा ही परमात्मा सिद्ध होता हैं|

इसी प्रकार महाभारत/गीता मे देखे-

अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषी तनुमाश्रितम| परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम|| (महाभारत 6:31:11) (गीता 9:11)
मेरे परम भावो को न जानने वाले मूर्ख लोग मुझे प्राणियो मे महान परमात्मा को मनुष्य शरीरधारी समझकर मेरा अपमान करते हैं
१. ऋग्वेद १.१६४.४६ – उसी एक परमात्मा को इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्या, सुपर्ण, गरुत्मान, यम और मातरिश्वा आदि अनेक नामों से कहते हैं.
२. यजुर्वेद ३२.१- अग्नि, आदित्य, वायु, चंद्रमा, शुक्र, ब्रह्मा, आप: और प्रजापति- यह सब नाम उसी एक परमात्मा के हैं.
३. ऋग्वेद १०.८२.३ और अथर्ववेद २.१.३- वह परमात्मा एक हैं और सब देवों के नामों को धारण करने वाला हैं, अर्थात सब देवों के नाम उसी के हैं.
४. ऋग्वेद २.१ सूक्त में अग्नि शब्द को ज्ञानस्वरूप परमात्मा का वाचक के रूप में संबोधन करते हुए कहाँ गया हैं की हे अग्नि, तुम इन्द्र हो, तुम विष्णु हो, तुम ब्रह्मणस्पति, वरुण, मित्र, अर्यमा, त्वष्टा हो. तुम रूद्र, पूषा, सविता, भग, ऋभु , अदिति, सरस्वती,आदित्य और ब्रह्मा हो.
५. अथर्ववेद १३.४ (२), १५-२०- जो व्यक्ति इस परमात्मा देव को एक रूप में विद्यमान जनता हैं, जो की वह न दूसरा हैं, न तीसरा हैं और न चौथा हैं ऐसा जानता हैं, जोकि वह पांचवा हैं, न छठा हैं और न सांतवा हैं ऐसा जानता हैं, जोकि वह न आठवां हैं, न नवां हैं और न दसवां हैं ऐसा जानता हैं, वह सब कुछ जानता हैं. वह चेतन और अचेतन संपूर्ण रहस्य को जन लेता हैं. उसी परमात्मा देव में यह सारा जगत समाया हुआ हैं. वह देव अत्यंत सहन शक्ति वाला हैं. वह एक ही हैं, अकेला ही वर्तमान हैं, वह एक ही है

कुरान पक्ष...

मुसलमान एक ही परमात्मा को मानते हैं, जिसे वोअल्लाह (फ़ारसी: ख़ुदा) कहते हैं। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। इस्लाम में परमात्मा को मानव की समझ से ऊपर समझा जाता है। मुसलमानों के अनुसार परमात्मा अद्वितीय हैः उसके जैसा और कोई नहीं। इस्लाम में परमात्मा की एक विलक्षण अवधारणा पर ज़ोर दिया गया है। साथ में यह भी माना जाता कि उसकी पूरी कल्पना मनुष्य के बस में नहीं है।

कुरान में...

कहो: है परमात्मा एक और अनुपम।

है परमात्मा सनातन, हमेशा से हमेशा तक जीने वाला।
उसकी न कोई औलाद है न वह खुद किसी की औलाद है।
और उस जैसा कोई और नहीं॥”
(कुरान, सूरत ११२, आयते १ - ४)

सूरए ज़ुमर की 66वीं आयत सभी को परमात्मा की उपासना का निमंत्रण देते हुए कहती है केवल परमात्मा की उपासना करो और कृतज्ञों में से हो जाओ। अर्थात सभी का पूज्य केवल और केवल अनन्य परमात्मा होना चाहिए।

क़ुरआने मजीद सूरए ज़ोमर की आयत क्रमांक 64 से 66 में अनेकेश्वरवाद और एकेश्वरवाद के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है। कह दीजिए कि हे अज्ञानियो! क्या तुम मुझसे यह कहते हो कि मैं परमात्मा के अतिरिक्त किसी और की उपासना करूँ? For more click this👇🏼👇🏼
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दोऊ दौड करत हैं, हिन्दू या मुसलमान।
ए जो उरझे बीच में, इनका सुंन मकान।।
प्रणाम जी

Tuesday, June 7, 2016

बार-बार विषयों का सुख लेते रहने पर चित्त में उनका संस्कार निर्मित होता है। संस्कार दृढ होकर वासना का रूप धारण कर लेता है। वासना के कारण मनुष्य की विषय-सुख की इच्छा बार-बार होती है। वह उन्हें प्राप्त करने और भोगने का प्रयास करता है। आसक्ति युक्त भोग से वासना बार-बार दृढ होती रहती है। जीवन के अन्त तक वह बहुत बढ जाती है। वासनाओं की तृप्ति के लिए जीव को बार-बार शरीर धारण करना पडता है। यह जीव के लिए विवशता है। इसे बंधन कहते हैं।
          विषयों का राग या आसक्ति स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ शिथिल और दुर्बल हो जाने पर अनासक्त हो जाने का भ्रम होता है। वस्तुतः वासनायें बडी सूक्ष्म और गहन होती हैं। वे वृद्धावस्था में सूक्ष्मस्प से बीज के समान चित्तभूमि में पडी रहती हैं। मरने के बाद जब अगला शरीर मिलता है, तो इन्द्रियाँ फिर सशक्त होने लगती हैं और पूर्व जन्म की वासनाऍ अंकुरित होकर जीव को पुनः भोगों में प्रवृत्त कर देती है। इस प्रकार जीव का बंधन जन्म-जन्मान्तर चलता है वह स्वतः कभी मुक्त नहीं होता।
     मुक्त होने के लिए जीव को प्रयास करना होता है। उसके लिए एक सुनिश्चित क्रमबद्ध रास्ता है। उस पर धैर्य के साथ आगे बढते रहने से अन्त में आत्मा और परमात्मा का ज्ञान होता है। उसे अनुभव हो जाता है । फिर वह विषयों का सुख झूठा समझकर त्याग देता है। जब परमात्मा का आनंद आता है तो जन्म जन्म के विकार अपने आप छूट जाते हैं..जब ये सुख आवे अंगमे तो छूट जाये सब विकार..www.facebook.com/kevalshudhsatye
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प्रणाम जी
सुप्रभात जी
हे साधुजन सत्यग्यान का अवतरण हो चुका है तुम भी उसे पाकर ग्यानमय हे जाओ...
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‘बुद्ध’ बौद्ध धर्म की भाषा में सत्य ग्यान देने वाले होते हैं। गौतम बुद्ध ने अपने मृत्यु के समय अपने प्रिय शिष्य आनन्दा से कहा था कि ‘‘नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूं और न तो अंतिम बुद्ध हूं। इस जगत् में सत्य और परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। यह पवित्र अन्तःकरणवाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा। ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न तथा समस्त लोगों का नायक (स्वामी)होगा। जिस प्रकार मैंने संसार को अनश्वर सत्य की शिक्षा प्रदान की, उसी प्रकार वह भी विश्व को सत्य की शिक्षा देगा। विश्व को वह ऐसा जीवन-मार्ग दिखाएगा जो शुद्ध तथा पूर्ण भी होगा। नन्दा! उसका नाम मैत्रेय होगा। (Gospel of Buddha, by Carus, P-217) बुद्ध का अर्थ ‘बुद्धि से युक्त’ होता है।
मैत्रेय का अर्थ 'दया से युक्‍त' होता है।
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प्रणाम जी

Sunday, June 5, 2016


समय निरंतर चलता रहता है। इसे न कोई रोक पाया है और न ही कोई रोक पायेगा इसलिय इसका इसप्रकार उपयोग करें की कम समय में ज्यादा लाभ हो। सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें आत्मआनंद की प्राप्ति नहीं होगी।
हमें आत्मआनंद की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है। लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा आत्मआनंद प्राप्त नहीं होगा।
चाहे हम योग की राह पर चलें या हम अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना ही बेहतर समझें, यदि हमने अपने आप को परमात्मा से जोड़ लें तो हमें सदैव आत्मआनंद प्राप्त होगा कयोंकी एकमात्र परमात्मा ही आनंद है अर्थात आनंद और बृह्म दोऊं एक है...
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प्रणाम जी

Saturday, June 4, 2016



विष्णु का अर्थ..
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प्रकृति के कोइ एक हि पदार्थ के जितने गुणवाचक नाम हो, उन सभी नाम के एक-एक स्वतन्त्र देव के रूप में विकसित हुए दिखते है । जैसे कि – आकाश स्थित सूर्य को आदित्य = पृथिवी के रसों का ग्रहण करनेवाला, पूषन् = पोषण करनेवाला, विष्णु= किरणोंको समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त करनेवाला, सवितृ= सभी जीवो का प्रसव करानेवाला । ये सभी स्वतन्त्र देव के सूक्त है । जिसमें विष्णु, जो सूर्य का ही व्यापनशील गुणवाले होने के कारण एक स्वतन्त्र देव के रूपमें स्तुत्य बने है ।

विष्णु शब्द विश् (प्रवेश-धात्) से व्युत्पन्न है । सूर्य ही अपने किरणों से तीनों लोक में एक साथ प्रवेश कर देता है (अर्थात ब्रह्म सभी जीवो पर समान कृपा करता है सब जिवो को समान पोषित करता है कयोंकी सूर्य अत्यनत तेजवान व सभी जीव जन्तु व वनस्पति आदि को पोषित करता है इसी कारण ब्रह्म को सूर्य कि संघ्या से संबोधित किया गया है )

 यास्कने निरुक्त में कहा है
‘‘यद् विषितो भवति तद् विष्णुर्भवति । विष्णुर्विशते र्वा व्यश्नोतेर्वा, तस्य एषा भवति ।‘‘
इसकी टीका में दुर्ग लिखते है –
 ‘‘यदा रश्मिभिरतिशयेनायं व्याप्तो भवति, व्याप्नोति वा रश्मिभिरयं सर्वम्, तदा विष्णुरादित्यो भवति । [3]
‘‘अर्थात् जब सूर्य रूपी बृह्म अपने किरणों से अतिशय रूपसे सभी जगह फैल जाता है अथवा जो (अपने) किरणों से सभी व्याप लेता है, इस कारण आदित्य को विष्णु कहा जाता है ...यह बृह्म के सत्ता रूप का द्योतक है आनंद बृह्म न्यारा है...

निर्गुण राम निरंजन राया, जिन वह सकल श्रृष्टि उपजाया ।
निगुण सगुन दोउ से न्यारा, कहैं कबीर सो राम हमारा ॥
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प्रणाम जी

Wednesday, June 1, 2016


पूर्ण सन्त की पहचान व उसके लक्षण हमारे सद्ग्रन्थों में लिखे हुए है ...पूर्ण सन्त की पहचान के लिए आप सभी सन्तों के ज्ञान का अध्ययन करिये..क्योंकि ज्ञान से ही सन्त की पहचान होगी। जो सन्त सभी शास्त्रों चाहे वेद हो या कुरान, के अनुकूल ज्ञान देता है वह पूर्ण ज्ञानी सन्त होगा और जो सन्त शास्त्रों के विपरीत ज्ञान बताता है और सत्य विषय के बाहर जाकर ज्ञान देता है वह नकली और अज्ञानी है।
आपजी सभी धर्मगुरुओं की किताबों का तुलनात्मक अध्ययन करिये। उनके प्रवचन सुन कर खुद समझिये कि इन धर्म गुरूओं द्वारा कही जा रही बातो का उल्लेख किसी धर्म शाश्त्र में है या कि नहीं है। जहा पर इन धर्म गुरूओ का ज्ञान समझ मे ना आये तब इनसे प्रश्न करिये और बार बार प्रश्न करिये। इस तरह सच्चाई का पता अपने आप चल जायेगा।
कबीर भेष देख मत भूलिये, बूझ लीजिये ज्ञान।
बिना कसौटी होत नहीं, कंचन की पहिचान।।
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प्रणाम जी