Sunday, October 30, 2016

*लक्ष्मी का अर्थ*

दीपावली के दिन जो पूजा होती है उसे लक्ष्मी पूजन कहा जाता है। आज ज्यादातर लोग समझते हैं कि लक्ष्मी का अर्थ है धन की देवी। ये लक्ष्मी शब्द का बहुत संकुचित अर्थ हो गया। वास्तव में इस शब्द का अर्थ बहुत विशाल है। लक्ष्मी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की लक्ष धातु से हुई है। लक्ष का शाब्दिक अर्थ है ध्यान लगाना, ध्येय बनाना, ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना इत्यादि। इसका अर्थ ये है कि जब हम एकाग्रचित्त होकर कोई कार्य या साधना करते हैं तो उसका जो फल प्राप्त होता है उसे लक्ष्मी कहते हैं। जैसे आगर आप अदूैत भाव में साधना करते है तो उसकेफलस्वरूप जो आप अदुैत मे एकरसता को पराप्त करते है वह अदुैत भाव में तो शब्दातीत भाव है पर शब्दो में कहें तो यह उस साधना का फल है इस फल को ही या  साधना के उस फलस्वरूप भाव को ही लक्ष्मी कहते है...
*अतः धन, मूर्ती या अन्य बाह्य साधनो से पूजा करके लक्ष्मी के भाव को तुच्छ ना बनायें अपितु इसका व्यापक अर्थ ग्रहण करें..*
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प्रणाम जी

Saturday, October 29, 2016

सुप्रभात जी

इस जगत के दूैत व मान्यता के जाल ने बंधन की गांठ को इस प्रकार जोर से बांधा हैं, कि मानव इसे सत्य एवं सुखद समझ कर आत्मा एवं परमात्मा के अदैत सम्बन्ध को असत्य मानने लगा हैं और इसके विपरीत दूैत के झूठी देह और जगत को सत्य माने बैठा हैं।

इस संसार के समस्त लोग शारीरिक सम्बंध को ही सच्चा मानते चले जा रहे हैं। आत्मा व परमात्मा की पहचान कोई भी नहीं करता। क्षण भंगुर शरीर के झूठे सम्बंधो को स्वीकार कर उन्हें पालन करने में सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं क्योंकि देह को ही उन्हों ने सर्वस्व मान लिया हैं।

इस शरीर पर चंदन का लेप लगाकर इसे बार बार धोते हैं और सुगन्धित इत्र आदि लगाते हैं फिर अच्छे अच्छे भोजन पका कर बडे प्यार से इसे पुष्ट करते हैं और इसकी सुरक्षा हेतु अनेक प्रयास करते हैं। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि उनकी यह द्रष्टि (लक्ष्य) तो नश्वर मिट्टी की काया - खाक से ही बांधी हैं।

इस शरीर का सर्वोतम और एक मात्र उपयोग आत्मा में परमात्मा को पहचान कर उस भाव को अदैुत प्रेम से पोषित करना है...
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प्रणाम जी

Wednesday, October 19, 2016

*एक बात और समझना,*
बहोत ध्यान से,  कि हम समर्पण और उपहार (gift)मे भेद न जान्ने के कारण परमात्मा में समर्पण ना करके उन्हे उपहार देने का प्रयास करते रहते है , ध्यान देना इसका भी केवल प्रयास करते हैं दे नही पाते , कयोंकी संवय को परमात्मा मे लगाना या उन्हे देना समर्पण है, और सवंय का कुछ परमात्मा को देना उपहार कहलायगा, ..
आप अपना मन उन्हेदेकर समर्पण सोच रहेहोना तो ध्यान से सुनो ये समर्पण नही उपहार देने का प्रयास कर रहे हो.. समर्पण होता है खुदको देना...अरे संसारी ग्यान से ही समझलो एकलव्य ने द्रोंण को अंगुठा दे दिया तो समर्पण कहलाया या गुरू दक्षिणा, ध्यानदेना *दक्षिणा* कहलाया समर्पण नही.. यही हम किये जा रहे है अपना अर्थात मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा चित ये तो आपका है आप नही हो, आपका दोगे तो उपहार होगा और सवंय को देना या लगाना समर्पण होगा...एक और संसारीक उदाहरण- कि जैसे पत्नी पती को कोइ भी अपनी वस्तु दे तो ये उपहार है, और खुद को देने से समर्पण हो जाता है..ध्यान रहे परमात्मा तुम्हारे उपहार का भूखा नही है, संसारीक बोल बोलूं तो उपहार देने का परयास करके तुम उसका अपमान कर रहे हो...

ये है अध्यात्म का A, और हम समझते हैं की गुरू से नाम ले लिया तो हमारी शुरूआत हो गयी हमारा कल्याण हो गया...
 *ध्यान दो*

 *केवल नाम लेके बैठना जीवन को व्यर्थ गवाना है* *और नाम लेके ये सोचना की मैने तारतम ले लिया है तो यह तारतम का घोर अपमान है* तारतम कोई लेने देने की वस्तु नही है...
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प्रणाम जी

Sunday, September 25, 2016

पी को काहां ढ़ूंड़ू मैं सखी री, जहां खोजे सब बीदेस |
सोई तो पियु मिले नही, जागी तो वो अपने देस ||

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Saturday, September 17, 2016

*मन*

म और न = मन
म=मैं - न=नही = जो आप सवंय नही हो वो मानी हूई मान्यता कि स्थिती है *मन* अर्थात जो आप नहि हो .
सत्य और स्थूल के बीच की *नही* की स्थिती मन है.. वास्तव में यह है ही नही यह केवल *मान्यता* है .. तो मन याने *मैं नही* अर्थात मन है ही नही केवल मान्यता है... तो जो है नही उसका तुमने पहाड वना रख्खा है .. और मान्यता में भ्रमित हो रहे हो..
*इलाज-* -- केवल एक, इस मान्यता अर्थात *नही* की जड़ (मूल, जहां से मान्यता उत्पन्न हुइ है)पर प्रहार....

इसलिय कहा है " *पर मनवा दिय विन हाथ न आवे सतकी बडी ठकुराई*
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प्रणाम जी

Tuesday, September 13, 2016

*दो बातें*

1- परमात्मा को पाने का प्रयास मत करना कयोंकी वो प्राप्त है .. हमारे अंदर है, बस मान्यता का परदा हटाने का प्रयास करो , जो बाधा है ...

2- "ग्यान" की स्थिती में परमात्मा से निरंतर साक्षातकार है.. ("ग्यान" जानकारी का बोझ नही है)
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प्रणाम जी

Thursday, September 8, 2016

दो बातें..
1- केवल तुम सवंय ही सत्य हो बाकी सब अंहकार है, असत्य है ,नही है..

2- सत्य कभी शब्दो में नही आता जो शब्दो में बताया जाये वो सब असत्य है...
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प्रणाम जी