Wednesday, April 12, 2017

*धार्मिकता कितने परकार की है?*

*धार्मिकता दो तरह की, एक प्रयासरत दूसरी प्रयास रहीत*
शुद्ध आनंद में लय के अतिरिक्त जो प्रयास हैं वे सब प्रयास रहीत धार्मिकता है..

अदूैत आनंद में लय ही सही प्रयासरत धार्मिकता है..

ध्यान देना अनुभव केवल *प्रयास रहीत* धार्मिकता में ही होते हैं ओर ये अनुभव भी कई प्रकार के हो सकते है.. कयोंकी इसमें अनुभव लेने वाला उपस्थित होता है..

प्रयासरत में अनुभव नही होता इसमें आनंद होता है..जो हम है, परमात्मा है, ये अदूैत आनंद है ये हमारा आनंद है .. यही हमारा लक्ष्य है..
इसलिय परयासरत रहो ..आनंद मार्ग को चुनो..
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Saturday, April 1, 2017

*अंदर और बाहर का कया अर्थ है ?*

अंदर से अभीप्राय शरीर के अंदर से नही है..
अंदर का अर्थ है,आत्मा, सवंय, आनंद, परमात्मा |

बाहर का अर्थ है, अदंर से अलग जो भी है वो बाहर है जैसे,शरीर, अंतःकरण, तीन गुण, सत्ता, ये आनंद की सत्ता होने के कारण इसमें आनंद भाषित होता है पर है नही |

अविद्या कया है ?

बाहर को ही अंदर समझना अविद्या है अग्यान है..

विद्या कया है ?

अंदर व बाहर के भेद व अभेद को जान्ना ही विद्या या ग्यान है...
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साधना कया है..
जो दृष्मान है वो तो सब साध्य है उसको कया साधना..
साधना तो वो है जो साध्य नही है .. तुम्हे सवंय अर्थात आत्मा या परमात्मा के अलावा और हर वस्तु का अनुभव है, धन, परिवार, साधन, मन व अंतःकरण आदि को तो तुम सदा से साध रहे हो, इनका तुम्हे सदा से अनुभव है..बस अनुभव नही है ते केवल सवंय का,इसी को साधना है बस यही सच्ची साधना है..कयोंकी तुम्हारे अलावा कुछ सच है ही नही.. सवंय को साधना ही सच्ची साधना है..
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सुप्रभात जी

पुस्तकीय ज्ञान दूसरों का ज्ञान है तुम्हारा अपना नहीं . ज्ञान तो स्वयं की अनुभूति का नाम है. देह मिली है जिसका अर्थ है प्रारब्ध और वासनाओं का व्यापार अभी शेष है . देह के सभी आवरण केवल भ्रांति हैं और भ्रांति का नाश केवल बोध से होता है . जो कुछ भी परिवर्तन शील है केवल भ्रांति हैं जिसने आत्मा को जान लिया, उसका संसार स्वयं छूट जाता है ,संसार छोड़ने से आत्म ज्ञान नहीं होता है, संन्यास लेना या देना जैसा कुछ भी नहीं होता हैं, यह विरक्ति और त्याग की ,मन की अवस्थाएँ हैं , अतः सच्चा सन्यास मानसिक व शाररिक  कार्य नहीं अपितु आत्म अनुभूति है।
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प्रणाम जी

Friday, March 10, 2017

*सबसे बडा विषय कया है..*

सबसे बडा विषय है कि तुम अपने को विषयों से युक्त मान्ते हो.. तुम कभी विषयों से युक्त नही हो सकते कयोंकी तुम आनंद हो..और जो विषय युक्त प्रतीत होता है तुम वो नही हो.. जो विषय युक्त है वो कभी विषय मुक्त नही हो सकता, और जो विषय मुक्त है वो कभी विषय युक्त नही हो सकता..
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प्रणाम जी

Sunday, February 5, 2017

*"विकार भेद"*

प्रश्न - विकार कितने प्रकार के हैं ? और वो कोनसे हैं ?
उत्तर - विकार दो प्रकार के हैं, मूल विकार और उप विकार | मूल विकार "अहं" है (आपके अदूेत सत्य आनंद स्वरूप से अन्य जो अपना अस्तितव मान रखा है,, जिसमें परमात्मा से अलगाव महसूस हो रहा है ये अहं है ) और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ये उप विकार हैं |
मूल विकार के समाप्त हुये बिना उपविकार समाप्त नही हो सकते ये असम्भव है.. और हम अन्नत जन्मो से यही भूल कर रहे हैं |

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Friday, February 3, 2017

सुप्रभात जी

यह संसार दो प्रकार का है- एक स्थूल, दूसरा सूक्ष्म | शब्दादिक विषय सम्बन्धी जितने भौतिक पदार्थ हैं, वही स्थूल संसार है एवं इन पदार्थों रे संयोग से हृदय में जो बलवती कामना है वही सूक्ष्म संसार है | स्थूल संसार के छोड़ देने से सूक्ष्म संसार नहीं समाप्त होता अर्थात् सांसारिक पदार्थों के परित्याग मात्र से इच्छायें नहीं समाप्त होतीं | किन्तु यदि इस स्थूल व सूक्ष्म के जंजाल से परे अस्तित्व व उस से भी परे  मूल आनंद अर्थात शूद्ध *सवंय*  का बोध हो जाय तो सूक्ष्म संसार अर्थात् इच्छाओं और स्थूल संसार का भान ही नहीं रहता |  इसलिय तू निरन्तर उस पद का बोध कर समस्त कामनाओं का परित्याग अपने आप हो जायगा | नही तो तू मुर्खों
की भांती जीवन व्यर्थ कर अवसर गवां देगा |
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प्रणाम जी