Wednesday, December 20, 2017

आत्मज्ञान एक समझ है सत्य को वैसे ही स्वीकारने की जैसा वो है, यह समझ है कि यही सब कुछ है, यही बिलकुल सही है , बस  यही है. आत्मज्ञान कोई उपलब्धि नहीं है, यह ये जानना है कि ना कुछ पाना है और ना कहीं जाना है.
Satsangwithparveen.blogspot.com

Tuesday, December 19, 2017

तीर्थयात्रा करने के लिए कहीं जाने की आवशयकता नहीं है।  सबसे अच्छी और बड़ी तीर्थयात्रा आपके अंतकरण की आत्मा की ओर है, जिसेमें विशेष रूप से अंतकरण शुद्ध हो जाता है। इसके अलावा कोई भी तीर्थयात्रा तुम्हे शुद्ध नहीं कर सकती चाहे पूरी उम्र वहीं बिता दो ।


  • Satsangwithparveen.blogspot.com

Monday, December 18, 2017

1- जिस तरह किसी दीपक को चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है ठीक उसी तरह आत्मा को जो खुद ज्ञान का स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है.

2- हमें आनंद तभी मिलता है जब हम आनंद कि तलाश नही कर रहे होते है.

Sstsangwithparveen.blogspot.com

Thursday, December 14, 2017

जो मान्यता को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करती है।

आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से  मान्यता के द्वारा उत्पन्न अज्ञान के संदेह को अलग कर दो. अनुशाषित रहो. उठो।

क्योंकि नर्क के तीन द्वार हैं: वासना, क्रोध और लालच ओर ये सब मान्यता रूपी पेड़ की ही टहनियां हैं ।

Satsangwithparveen.blogspot.com
जो भी मनुष्य अपने जीवन में अध्यात्मिक ज्ञान के लिए दृढ़ संकल्पो मे स्थिर हैं, वह समान्य रूप से संकटो के आक्रमण को सहन कर सकते हैं. और निश्चित रूप से यह व्यक्ति आनंद और मुक्ति होने के पात्र हैं।
परमात्मा की शांति उनके साथ होती हैं जिसके मन और आत्मा मे एकता हो, वो इच्छा और क्रोध से मुक्त होते हैं, जो आत्मा को सही मायने मे जनता हो।
Satsangwithparveen.blogspot.com

Monday, December 4, 2017

*जैसे शुक्षम शरीर होता है, क्या वैसे ही सूक्ष्म संसार भी होता है ? अगर हां तो वो क्या है??*

 यह संसार दो प्रकार का है- एक स्थूल, दूसरा सूक्ष्म | शब्दादिक विषय सम्बन्धी जितने भौतिक पदार्थ हैं, वही स्थूल संसार है एवं इन पदार्थों की हृदय में जो बलवती कामना है वही सूक्ष्म संसार है | स्थूल संसार के छोड़ देने से सूक्ष्म संसार नहीं समाप्त होता अर्थात् सांसारिक पदार्थों के परित्याग मात्र से इच्छायें नहीं समाप्त होतीं | किन्तु यदि आत्मबोध हो जाय तो सूक्ष्म संसार अर्थात् इच्छाओं और स्थूल संसार का भान ही नहीं रहता |  इसलिय तू निरन्तर आत्मपद का अभ्यया करने से वासमनाओं का परित्याग अपने आप हो जायगा | नही तो यह जीवन  मुर्खों की भांती जीवन व्यर्थ निकल जायेगा |
Satsangwithparveen.blogspot.com

प्रणाम जी

Friday, December 1, 2017

अध्यात्मज्ञान नित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११)


आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना अध्यात्म का आरम्भ है। उसके संरक्षण में चलते हुए परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। यही अध्यात्म की पराकाष्ठा है। इसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ है अज्ञान है।