Friday, June 8, 2018

दुख मिटाना चाहते हैं????

एक माता जी ने आते ही पूछा था कि 'क्या दुख मिटाया जा सकता है?' मैं उन्हें देखता हूं, वे दुख की प्रतिमा मालूम होती हैं।

और सारे लोग ही धीरे-धीरे ऐसी ही प्रतिमाएं होते जा रहे हें। वे सभी दुख मिटाना चाहते हैं, पर नहीं मिटा पाते हैं, क्योंकि दुख निदान जो वो कर रहे हैं वो सत्य नहीं है।
चेतना की एक स्थिति में दुख होता है। वह उस स्थिति का स्वरूप है। उस स्थिति के भीतर दुख से छुटकारा नहीं है। कारण, वह स्थिति ही दुख है। उसमें एक दुख हटायें, तो दूसरा आ जाता है। यह श्रंखला चलती जाती है। इस दुख से छूटें, उस दुख से छूटें, पर दुख से छूटना नहीं होता है। दुख बना रहता है, केवल निमित्त बदल जाते हैं। दुख से मुक्ति पाने से नहीं, चेतना की स्थिति बदलने से ही दुख समाप्त होता है- दुख-मुक्ति होती है।
एक अंधेरी रात गौतम बुद्ध के पास एक युवक पहुंचा , दुखी, चिंतित, संताप ग्रस्त। उसने जाकर कहा , 'संसार कैसा दुख है, कैसी पीड़ा है!' गौतम बुद्ध बोले थ,'मैं जहां हूं, वहां आ जाओ, वहां दुख नहीं है, वहां संताप नहीं है।'

एक चेतना है, जहां दुख नहीं है। इस चेतना के लिए ही बुद्ध बोले थे, 'जहां मैं हूं।' मनुष्य की चेतना की दो स्थितियां हैं, अज्ञान की और ज्ञान की, पर की और स्व-बोध की। मैं जब तक 'पर' से संबंध कर रहा हूं, तब तक दुख है। यह पर-बंधन ही दुख है। 'पर' से मुक्त होकर 'स्व' को जानना और स्व में होना दुख-समाप्ति है। मैं अभी स्वयं नहीं हूं, इसमें दुख है। मैं  जब समाप्त होकर केवल "है" होता है, तब दुख मिटता है।

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Thursday, June 7, 2018

अंतःकरण शुद्ध हुए बिना ब्रह्मज्ञान?????

*मैंने संतो से सुना है की अंतःकरण शुद्ध हुए बिना ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं होता, और उसके लिए भौतिकत्याग, वैराग्य और परमात्मा के लिऐ रोना आदि मार्ग बताते है, इसलिए ब्रह्मज्ञान बोहोत दूर की वस्तु लगती है क्या करू?*

जो लोग ब्रह्मज्ञान की बातें करते हैं, अक्सर वे तोते की तरह एक ही रट लगाये रहते हैं किड— जीवन का कोई अर्थ नहीं है... संसार में तो दुख ही दुख है... जीवन तो विकारों से भरा पड़ा है, आदि आदि। क्योंकि अधिकतर  तो संसार को छोड़ने वाले ही ब्रह्मज्ञान की बातें करते हैं, इसलिये हमें लगता है कि  ब्रह्मज्ञान किसी प्रकार के त्याग पर आधारित है। इसलिये ब्रह्मज्ञान से हमें भय लगने लगता है।
लेकिन यह भय निराधार है। हम आप को यह बताना चाहते हैं कि ब्रह्मज्ञान कोई त्याग नहीं है — यह तो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ब्रह्मज्ञान आपको संपूर्ण सुख देता है — भौतिक भी और अध्यात्मिक भी। ब्रह्म का तो अर्थ ही आनन्द है।
ब्रह्मज्ञान कोई हौव्वा नहीं है। यह तो एक व्यवहारिक सूत्र है जो हमारी उच्चतम सफलता का मार्ग खोलता है।
*खोने का नाम ब्रह्मज्ञान नहीं है, पाने का ब्रह्मज्ञान है, स्वयं को पाना, ब्रह्मज्ञान में त्यागना कुछ भी नही है, त्याग और व्यराग तो शारीरिक विषय है, ब्रह्मज्ञान से भौतिक पदार्थ छुटते नहीं है बल्कि आपको उनके भोग के सही सुत्र का ज्ञान हो जाता है, जिस से आप उनका और बेहतर तरीके से प्रयोग कर सकते हैं*
आनन्द ही ब्रह्म है — इस बोध में ब्रह्मज्ञान है।
यहाँ पर एक बात को ठीक से समझना है — ब्रह्म और आनन्द एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। ब्रह्म आनन्द से अलग नहीं है, आनन्द ब्रह्म से अलग नहीं है। ऐसा नहीं है कि ब्रह्म में आनन्द है, और ऐसा भी नहीं है कि आनन्द में ब्रह्म है। तथ्य यह है कि आनन्द ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आनन्द है...
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प्रणाम जी

Wednesday, June 6, 2018

मृत्यु के बाद परमधाम ?????

*अगर मै पूरी जिंदगी भक्ति करूं तो क्या मृत्यु के बाद परमधाम चला जाऊंगा ?*

जो लोग सोचते है की नाम जाप, भजन, भक्ती तिर्थ, तप, ध्यान आदी से मृत्यु के बाद वो किसी आनंद के लोक या परमधाम में चले जायेंगे तो वो धोर अंधकार में हैं | उस आनंद की स्थिती को पहले ही पा कर उस पद में मृत्यु से पहले ही लय होना होगा  तभी शरीर समाप्ती के पश्चात वह स्थिती बनी रह सकती है | अन्यथा अनंनत जन्मों के लिय धोर अंधकार है..
*उस ब्रह्म से प्रकट यह संपूर्ण विश्व है जो उसी प्राण रूप में गतिमान है। उद्यत वज्र के समान विकराल शक्ति ब्रह्म को जो मानते हैं, अमरत्व को प्राप्त होते हैं। इसी ब्रह्म के भय से अग्नि व सूर्य तपते हैं और इसी ब्रह्म के भय से इंद्र, वायु और यमराज अपने-अपने कामों में लगे रहते हैं। शरीर के नष्‍ट होने से पहले ही यदि उस ब्रह्म का बोध प्राप्त कर लिया तो ठीक अन्यथा अनेक युगों तक विभिन्न योनियों में पड़ना होता है।'।। 2-8-1।।-तैत्तिरीयोपनिष*
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Monday, June 4, 2018

छप्पर पर ऊंट

सत्य की खोज स्वयं में ही करनी होगी। वह खोज कम, आत्म-बोध ही ज्यादा है। जो उसके लिए पूर्णरूपेण तैयार हो जाता है, उसका सत्य स्वयं उन्हें खोजता है।
 फकीर इब्राहिम उनके जीवन में घटी एक घटना कहा करते थे। साधु होने के पूर्व वे बल्ख के राजा थे। एक बार जब वे आधी रात को अपने पलंग पर सोये हुए थे, तो उन्होंने सुना कि महल के छप्पर पर कोई चल रहा है। वे हैरान हुए और उन्होंने जोर से पूछा कि ऊपर कौन है? उत्तर आया कि कोई शत्रु नहीं। दुबारा उन्होंने पूछा कि वहां क्या कर रहे हो? उत्तर आया कि ऊंट खो गया है, उसे खोजता हूं। इब्राहिम को बहुत आश्चर्य हुआ और अज्ञात व्यक्ति की मूर्खता पर हंसी भी आई। वे बोले, ''अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खो जाने और खोजने की बात तो बड़ी ही विचित्र है। मित्र, तुम्हारा मस्तिष्क तो ठीक है?'' उत्तर में वह अज्ञात व्यक्ति भी बहुत हंसने लगा और बोला, ''हे निर्बोध, तू जिस दिशा में परमात्मा को खोज रहा है, क्या वह अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खोजने से भी ज्यादा विचित्र नहीं है?''

रोज ऐसे लोगों को जानने का मुझे अवसर मिलता है, जो स्वयं से बाहर परमात्मा को पाना चाहते हैं। ऐसा होना बिलकुल ही असंभव है, परमात्मा कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही खोज की अंतिम चेतना-अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

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Sunday, June 3, 2018

कब्र

मैंने सुना है कि क्राइस्ट ने लोगों को कब्रों से उठाया और उन्हें जीवन दिया। जो स्वयं को शरीर जानता हे, वह कब्र में ही है। शरीर के ऊपर आत्मा को जानकर ही कोई कब्र से उठता और जीवित अवस्था में होता है।

 एक बार किसी प्राचीन आश्रम में किसी साधु की मृत्यु हो गई थी। उसे भूमि-गर्भ में निर्मित विशाल मुर्दाघर में उतार दिया गया। लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से वह मरा नहीं और कुछ समय बाद मृतकों की उस बस्ती में होश में आ गया। उसकी मानसिक पीड़ा और संताप की कल्पना करना भी कठिन है। उस दुर्गध और मृत्यु से भरी अंधेरी बस्ती में, जहां सैकड़ों मुरदे सड़ रहे थे, वह जीवित था! बाहर पहुंचने का कोई मार्ग नहीं, आवाज बाहर पहुंच सके, इस तक की कोई संभावना नहीं। वह साधु वहीं जीने लगा। कीड़े-मकोड़े उसका भोजन बन गये। मृत्यु-गृह की दीवारों से रिसता गंदा पानी वह पी लेता और कीड़ों पर निर्वाह करता। मुरदों के कपड़े निकाल कर उसने अपने सोने और पहनने की व्यवस्था कर ली थी। और, वह निरंतर अपने किसी साथी की मृत्यु के लिये प्रार्थना करता रहता। क्योंकि, किसी के मरने पर ही उस अंध-गृह के द्वार खुल सकते थे। वर्ष पर वर्ष बीते उसे तो समय की भी पता नहीं पड़ता था। फिर एक दिन कोई मरा, तो द्वार खुले और लोगों ने उसे जीवित पाया। और, जब लोग उसे बाहर निकाल रहे थे, तब वह मुरदों से उतारे गये कपड़े और उनके कपड़ों में से इकट्ठे किये गये रुपये-पैसे साथ ले लेना नहीं भूला था! 

*यहअतीत में घटी कोई घटना है या कि स्वयं हमारे जीवन का प्रतिबिंब?*

क्या यह घटना हम सबके जीवन में अभी और यहीं नहीं घट रही है? मैं देखता हूं, तो पाता हूं कि हममें से प्रत्येक एक दूसरे की मृत्यु के लिए प्रार्थना कर रहा है(सब शरीरों में ही भाव रखने की कहते हैं) सब की मुर्दों की बस्ती में हैं, जहां से बाहर निकलने के लिए कोई द्वार नहीं मालूम होता है। और, हम भी दूसरे मुरदों के कपड़े और पैसे छीन रहे हैं। और हमारा निर्वाह भी कीड़े-मकोड़ों पर ही है। और, यह सब हो रहा है, आत्म ज्ञान के अभाव के कारण। अंध-जीवेषणा से परिचालित व्यक्ति वास्तविक जीवन को अनुभव नहीं कर पाता। उसकी धुंध से जो मुक्त होता है, वही जीवन (आत्मा)को जानता है। अन्यथा ये चेतना कब्र में ही है, ऐसा ही जानना है।

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Saturday, June 2, 2018

"मैं" साधक हूं

'मैं साधक हूं।परमात्मा की साधना में लगा हूं। क्रमश: गति होती जा रही है, एक दिन प्राप्ति भी हो जाएगी।'
एक साधु ने एक दिन मुझ से यह कहा था। उनके शब्दों में मुझे साधना नहीं, वासना ही लगी थी। ऐसी साधना भी बधा है। जो है, उसे पाने का अभ्यास क्या करना ! उसे पाना नहीं, यह जानना है कि वह खोया ही नहीं। और उसे पाने का अभ्यास इस सत्य को छिपा देता है कि उसे खोया ही नहीं। मैं जो हूं, उसे बदलना है। समस्त इच्छाओं के मूल में यही होता है, यही द्वैत होता है। यह द्वैत ही जगत है और दुख है।
मैं कहता हूं, 'आप जो हो, उससे जरा भी कुछ और होने की आकांक्षा यदि है, तो आप 'जो हो' उसके विपरीत जा रहे हो।' और 'जो है'- वही मार्ग है। 'जो है'- उसके प्रति जागते ही जीवन एक सहजता और सौंदर्य से भर जाता है। वास्तविक सत्य एक अभ्यासी को कभी उपलब्ध नहीं होता है। उसमें एक हिंसा, एक दमन और कुछ 'होने' की वासना के लक्षण उसके मूल बोध को नष्ट कर देते हैं। 

फिर क्या करें? कुछ भी नहीं। न करना, कुछ भी न करना ध्यान है। कर्म में आत्मा नहीं है, विचार में आत्मा नहीं है। कर्म और विचार के बाहर होते ही वह आविष्कृत हो जाता है। सब छोड़ दो, सब मिट जाने दो, सब विलीन हो जाने दो। और फिर इस 'न-कुछ' में जो दिखता है, वही सब-कुछ है।

सब छोड़ने का अर्थ पलायन नहीं है, छोड़ना भी कुछ नहीं है क्योंकि तुमने कुछ पकड़ा ही नहीं है..

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Friday, June 1, 2018

दो प्रकार का संसार

सुप्रभात जी

अरे मन ! यह संसार दो प्रकार का है- एक स्थूल, दूसरा सूक्ष्म | शब्दादिक विषय सम्बन्धी जितने भौतिक पदार्थ हैं, वही स्थूल संसार है एवं इन पदार्थों की हृदय में जो बलवती कामना है वही सूक्ष्म संसार है | स्थूल संसार के छोड़ देने से सूक्ष्म संसार नहीं समाप्त होता अर्थात् सांसारिक पदार्थों के परित्याग मात्र से इच्छायें नहीं समाप्त होतीं | किन्तु यदि आत्मबोध हो जाय तो सूक्ष्म संसार अर्थात् इच्छाओं और स्थूल संसार का भान ही नहीं रहता |  इसलिय तू निरन्तर आत्मपद का पथिक, वासमनाओं का परित्याग अपने आप हो जायगा | नही तो तू मुर्खों की भांती जीवन व्यर्थ कर अवसर गवां देगा |
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प्रणाम जी