Thursday, August 9, 2018

मैं कोन हूं

*मैं सवंय कौन हूं??*
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इस संसार आडम्बर में मैं कौन हूँ जो बोलता हूँ?? देह और यह जगत् तो मैं नहीं, यह तो असत्य उपजा है और जड़रूप पवन से स्फुरणरूप होता है सो मैं कैसे होऊँ?

यह देह भी मैं नहीं क्योंकि यह तो क्षण-क्षण में काल से लीन होता है और जड़ रूप है।

श्रवणरूपी जड़ भी मैं नहीं, क्योंकि जो शब्द सुनते हैं वह शून्य से उपजा है

त्वचा इन्द्रिय भी मैं नहीं इसका क्षण-क्षण विनाश स्वभाव है।

प्राप्त हुआ अथवा न हुआ, यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, इन्द्रियाँ आप जड़ हैं पर इनके जानने वाला चैतन्य तत्त्व है और चैतन्य के प्रमाद से ये विषय उपलब्धहोते हैं । इससे न मैं त्वचा इन्द्रिय हूँ, और न स्पर्श विषय हूँ, यह जड़ात्मक है

यह जो चच्चलरूपी तुच्छ जिह्वा इन्द्रिय है और जिसके अग्र में अल्प जल अणु स्थित है वही रस ग्रहण करता है, वह रस भी जीवसत्ता करके लब्धरूप होता है वो आप जड़ है,
इससे यह जड़रूप जिह्वा और रस मैं नहीं

ये जो विनाशरूप नेत्र दृश्य के दर्शन में लीन हैं सो मैं नहीं और न मैं इनका विषयरूप हूँ, ये जड़ हैं । यह जो नासिका पृथ्वी का अंश है सो केवल जीव के आधार है यह आप जड़ है पर इसका जाननेवाला चैतन्य है, सो न मैं नासिका हूँ, न गन्ध हूँ, मैं अहं मम से और मन के मनन से रहित शान्तरूप हूँ और ये पञ्च इन्द्रियाँ मेरे में नहीं

*मैं शुद्ध चैतन्यरूप कलना कलंक से और चित्त से रहित चिन्मात्र  निःसंकल्प निर्मल शान्तरूप हूँ ।* अब मुझको अपना स्वरूप स्मरण आता है । *प्रकाशकरूप चैतन्य अनुभव अद्वैत मेरे अनुभव से स्थित है*।
मेरी एक और *मैं* सवंय प्रकृती के साथ स्थित था जिस कारण मेरा मन अन्नत प्रयास के बाद भी अदूैैत परमात्मा में नही लग रहा था.. सदा से मैं सवंय प्रकाशकरूप चैतन्य  अद्वैत परमात्मा में स्थित हूं , अब में इस बोध से बोधित होकर *बुद्ध* हो गया हूतो मन आदी भी अब यहीं है..

इसलिय सवंयम की खोज करने से मूल तत्व का मार्ग मिलेगा..
*पेहेले आप पेहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो ।
बिना आप चीन्हें पार ब्रह्मको, कौन कहे मैं जानो।।*
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प्रणाम जी

Wednesday, August 8, 2018

दो प्रकार का वैराग्य

*वैराग्य की दो भाव दशाएँ हैं*

१. साधन वैराग्य, २. सिद्ध वैराग्य।
इन्हें यूँ भी कहा जा सकता है, १. अपर वैराग्य, २. पर वैराग्य।
इस साधन वैराग्य या अपर वैराग्य को ही वशीकार संज्ञा दी गयी है। इस का मतलब है—देखे और सुने गए विषयों के प्रति वितृष्णा। इनके प्रति भोगासक्ति का न होना। इन विषय भोगों के लिए मन में गहरी निराकांक्षा। ऐसा होना ही अपर वैराग्य है।

*सिद्ध वैराग्य यापर वैराग्य क्या है?*

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ १/१६॥
(योगदर्शन)
शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से;गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह;परम्= पर वैराग्य है। 
अर्थात् यह पर वैराग्य निराकांक्षा की अन्तिम अवस्था है- मान्यता के पुरुष के परम शुद्ध निर्विकार पुरुष के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना। (यहां दो पूरूषो का जिक्र है इनके विषय में जान्ना परम आव्यशक है ..श्वेताश्वतर उपनिषदमें भी यह बात स्पष्ट की है ।
द्वा सुपर्णा सयुजौ सखायौ, समाने वृक्षे परिषस्वजाते ।
तयोरेकं पिप्पलं स्वादुमत्तिः अनश्ननन्यो अभिचाकषीति ।।

अर्थात् एक वृक्षमें दो पक्षी सखाभावसे रहते हैं । उनमेंसे एक उस वृक्षके फलका आस्वादन करता है तो दूसरा मात्र देखता रहता ) *इसकी पूर्ण व्याख्या के लिय आप हमारी कर्ता भोक्ता भेद की post पढ. सकते हैं*

       वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। सवंय में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना सवंय में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह निर्विकार भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। 
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प्रणाम जी

Monday, August 6, 2018

मन क्या है

*मन का भेद*

अहं की उपस्थिती से उत्पन्न भाव, दशा, स्थिती, या अनुभव मन है.. ध्यान के अनुभव या भजन भक्ती में होने वाले सुख या आनंद का भास भी इसके अंतर्गत आते हैं..
प्रश्न-कया मन होता है ?
उत्तर- नही मन है ही नही, ये तो अहं का क्रिया या अक्रिया का भास है..
कया मन का लय होना होता है?
उत्तर - नही मन का कभी लय नही होता..

प्रश्न- आप कहते हो की मन है ही नही, फिर कहते हो की मनका लय नही होता, कया ये विरोधाभास नही है ??
उत्तर- अहं की उपस्थिती ही मन कहा जाता है अर्थात जो है वो अहं ही है, मन का कोई अलग अस्तितव नही है, इसलिय कहा है मन नही है |
*मनका लय नही होता* का अर्थ है की जब मन है ही नही तो लय किस का होगा, जब तक अहं है इस मन के भास के भाव का लय नही होता, लय केवल अहं का होना है, अहं के लय के साथ ही इसकी उपस्थिती से उत्पन्न भाव का भी लय हो जाता है जिसे आप मन कहते हो | अहं की उपस्थिती की क्रिया को ही मन, चित, बुद्धि, अंकार कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही मन कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही बुद्धि कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही चित कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही हृदय कह दिया जाता है, परन्तु ये अहं ही है |
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Sunday, August 5, 2018

सूची

 एक दिन मैंने सूची बनाई थी- उन सब तत्वों को पाने की, जिन्हें पाकर व्यक्ति धन्यता को उपलब्ध होता है। स्वास्थ्य, सौंदर्य, सुयश, शक्ति, संपत्ति- उस सूची में सब कुछ था। उस सूची को लेकर मैं एक बुजुर्ग के पास गया और उनसे कहा कि क्या इन सब बातों में वो सब नहीं आता जो मुुुझेे चाहिए ? मेरी बातों को सुन और मेरी सूची को देख उन वृद्ध की आंखों के पास हंसी इकट्ठा होने लगी थी और वे बोले थे, ''मेरे बेटे, बड़ी सुंदर सूची है। अत्यंत विचार से तुमने इसे बनाया है। लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण बात तुम छोड़ ही गये हो, जिसके अभाव में शेष सब व्यर्थ हो जाता है।  मैंने पूछा, ''वह क्या है?'' क्योंकि मेरी दृष्टिं में तो सब-कुछ ही आ गया था। उन वृद्ध ने उत्तर में मेरी पूरी सूची को निर्ममता के साथ काट दिया और कहा कि जो तुम चाह ते हो ये वो सब नहीं है । उन सारे शब्दों की जगह उन्होंने केेेवल एक शब्द लिखा, "आनंंद"

ओर कहा, जो तुमने सूची बनाई है वो तो सब बाहर मिलने वाला सामना है, पर जो तुम चाहते हो वो तुम्हे अंदर मिलेगा, ये दोनों अलग अलग स्थान पर मिलने वाली वस्तुएं हैं, बस तुम इतनी सी बात नहीं समझ रहे हो। तुम समझते हो तुम्हारी बनाई सूची से तुम्हे आनंद मिलेगा, पर तुम ये नहीं समझ पाए कि आनंद किसी वस्तु में नहीं होता बल्कि आनंद तो अपने आप में स्वतंत्र है, वो किसी वस्तु में नहीं होता बल्कि खुद में ही होता है, इसके मार्ग वस्तुओं से अलग है ।

आनंद को चाहो, वतुओ को नहीं। लेकिन, ध्यान रहे कि उसे तुम अपने भीतर नहीं पाते हो, तो कहीं भी नहीं पा सकोगे। आनंद कोई बाह्य वस्तु नहीं है। वह तो स्वयं ही हो, ध्यान रहे कि हर परिस्थिति में भीतर संगीत बना रहे। अंतस के संगीतपूर्ण हो उठने का नाम ही आनंद है। वह कोई रिक्त और खाली मन:स्थिति नहीं है, किंतु अत्यंत सत्य संगीत की भावदशा है।

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Saturday, August 4, 2018

ध्यान क्या है

ध्यान कया है??

अनुभव का मूल में लय ही ध्यान है |
सीर्फ आखें बंन्ध करके ही ध्यान नही होता, पर ध्यान के लिय आंखे बन्द करके अभ्यास करना सहायक हो सकता है |
आखें बन्द करके नाद, प्रकाश, लोक लोकान्तर दोखना और प्रमधाम की चितवनी लगाना, या परमात्मा को दोखना ध्यान नही है , ये सब अनुभव हैं, जब ये अनुभव मूल में लय होकर केवल मूल ही शेष रहे तब ध्यान है | एकबार ये हो जाये फिर आखें खुली हो या बंद फर्क नही पड़ता..ध्यान आनंद है, आनंद आप हो, आनंद परमात्मा है, ध्यान आपकी स्भाविक स्थिती है |
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Friday, August 3, 2018

मृत्यु से बचने का उपाय

*कृपया ऐसा कोई उपाय बताएं कि में जीवन मृत्यु से मुक्त हो जाऊं, मुझे बार बार मृत्यु का सामना ना करना पड़े ।*

मृत्यु से घबराकर हमने परमात्मा का अविष्कार कर लिया है । भय पर आधारित परमात्मा से असत्य और कुछ भी नहीं है। सारी उम्र मृत्यु के भय में अपना परमात्मा बना के उसके सहारे जीवन बिता देते हो, झूठ से बचने के लिए झूठ का सहारा लेते हो तो शत प्रतिशत तुम फसने वाले हो झूठे मृत्यु के जाल में क्योंकि अंधेरा अंधेरे का इलाज नहीं है । तुम मरोगे नहीं, यही सत्य है, यही सत्य का पहला कदम है । क्योंकि अगर तुम मर जाते तो जो तुम आज हो ये कोन है ?

समाप्त होने के बाद क्या तुम दोबारा वन गए ? नहीं, 

जो समाप्त हुआ था वो दोबारा नहीं बना, ओर जो समाप्त नहीं हुआ था वहीं आज मृत्यु से डर रहा है । जिसकी मृत्यु नहीं हुई थी, जो आज है, वह कल भी रहेगा, फिर झूठे भय में क्यों झूठ का सहारा लेकर झूठ का जाल बना कर उसमे उलझते हो । तुम नहीं मरोगे ये सत्य है, अब इसी सत्य से अपना सफर शुरू करो । सत्य को धारण करके सत्य को उपलब्ध हो जाओ । नहीं तो झूठे मृत्यु का भय दिखा कर कोई भी पाखंडी तुम्हे अपना दास बना लेगा । जैसे अनेक लोगों को बना रखा है ।

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Thursday, August 2, 2018

ज्ञान ओर प्रेम का सही अर्थ

*ग्यान और प्रेम में क्या भेद है*

जिन लोगो को या ग्यानीयों को ग्यान में आनंद आता है वो प्रेम को ज्यादा अहमियत नही देते, वो अपने आप को अपने स्थान पर सही मानते है व प्रेम के लिय ग्यान से मिलने वाले आनंद को छोड़ना नही चाहते..
वहीं जो प्रेमी होते हैं वो प्रेम में ही आनंद लेते है रोते हैं रिझाते हैं | ये भी अपने को ग्यानीयों से सही मान्ते हैं व प्रेम से मिलने वाले आनंद को छोड़ नही सकते..
इसलिय ये दो मार्ग बन गये..
*अब प्रश्न उठता है की सही मार्ग कौन सा है और कया वो इन दोनो से अलग है और यह भी कहा गया है की सभी मार्ग परमात्मा की और जाते हैं फिर गलत कया है ???*
इन सभी शंकाओं का निवारण आज हम इस पोस्ट में करेंगें तो ध्यान से पढिये...
तो ध्यान दो ग्यान और प्रेम ये दो वस्तुऐ नही हैं, ये एक ही वस्तु के दो नाम याहां ध्यान देने वाली बात यह है की ग्यानी और प्रेमी ये दो अलग भाव के नाम हैं ये दूैत के नाम हैं पर ग्यान व प्रेम दो नही हैं यह एक ही है.. ये अदूैत के भाव हैं |
ग्यान व प्रेम एक कैसे है ?
जब ग्यानी और प्रेमी समाप्त हो जाता है तब ग्यान और प्रेम शेष रहता है यह वही है जो सत्य है नित्य है और जो आनंद है यही आत्मा है यही परमात्मा है यही ग्यान है यही प्रेम है | इसलिय ये एक ही है दो नही है.. ग्यानी और प्रेमी दो हैं कयोंकी इनमें अहं विद्यमान रहता है अहं से ही ग्यानी और प्रेमी हो जाते हैं|
सभी मार्ग परमात्मा की और जाते हैं फिर गलत कया है ???
ग्यानी को ग्यान में *आनंद* आता है प्रेमी को प्रेम में *आनंद* आता है दोनो अपने को सही मानते हैं कयोंकी दोनो को *आनंद* आता है | याहां ध्यान देने वाली वाल यह है की दोनो में आनंद की समानता है , दोनो का जो कोमन भाव है वह आनंद है और आनंद ही आत्मा है आनंद ही परमात्मा या बृह्म है, तो अब बात को ध्यान से पकडना की आनंद कही बाहर से नही आता ये दोनो का सवंय का ही आनंद है जो उन्हे ग्यानी और प्रेमी होने मे भास हो रहा है इसलिय मार्ग दोनो का एक ही है *आनंद* इसलिय सभी मार्ग आनंद की और ही जाते है पर इनमें जो गलत है वो है *अहं* जिस की उपस्थिती से ग्यानी और प्रेमी हो जाते हो.. भोग व योग में भी आनंद है कयोंकी सब आनंद से ही बना है पर अहं के कारण भोगी व योगी हो जाते हो.. तो सभी मार्ग जैसे कर्म, ग्यान, योग, भक्ती, प्रेम, या भोग सभी आनंद के ही मार्ग हैं पर ये सभी अहं के कारण सत्य से विमुख हैं, अहं समाप्ती के बाद सब एक ही हैं दो तीन या चार नही हैं....

*ए मैं मैं क्यों ए मरत नहीं,और कहावत है मुरदा। आड़े नूर जमाल के, एही है परदा।*

प्रणाम जी
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