Wednesday, September 12, 2018

जानिए मृत्यु को इस पोस्ट में

'मृत्यु क्या है?'
 'जीवन को हम नहीं जानते हैं, इसलिए मृत्यु है। स्व-को नहीं जानना मृत्यु है, अन्यथा मृत्यु नहीं है, केवल परिवर्तन है। 'स्व' को न जानने से एक कल्पित 'स्व' हमने निर्मित किया है। यही है हमारा 'मैं' -अहंकार।'
यह है नहीं, केवल आभास है। यह झूठी इकाई ही मृत्यु में टूटती है। इसके टूटने से दुख होता है, क्योंकि इसी से हमने अपना "होना" स्थापित किया था। जीवन में ही इस भ्रांति को पहचान लेना मृत्यु से बच जाना है। जीवन को जान लो और मृत्यु समाप्त हो जाती है। जो है, वह अमृत है। उसे जानते ही नित्य, शाश्वत जीवन उपलब्ध हो जाता है।

'स्व-ज्ञान जीवन है। स्व-विस्मरण मृत्यु है।'

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Monday, September 10, 2018

जानिए गुरु तत्व क्या

सतगुरुतत्व क्या है ?

ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिरूपम्,
भावातीतं त्रिगुण रहितं सतगुरु तन्नमामि ॥
(स्कन्द्पुराणे गुरुगीतायम्)

अर्थ:= *सच्चिदानंद ब्रह्म आनन्द स्वरूप है, उसका आनंद ही प्रत्येक प्राणी में अक्रषण रूप में विद्यमान रह कर उसे आनंद की और आकर्षित करता है, यही आनंद जब आंतरिक रूप में जान लिया जाता है तो इसी को सत्गुरु य गुरुतत्व कहा जाता है।वही मूल आनंद आकर्षण सत्गुरु हैं। क्योंकि गु का अर्थ है अंधेरा या माया और रू का अर्थ है आनंद या प्रकाश,तो जो माया रूपी अंधेरे में आंतरिक आनंद रूपी प्रकाश के आकर्षण के माध्यम से हमें सत्य आनंद का बोध होता है यही माध्येम गुरूतत्वा या सतगुरु है* इसी आनंद के माध्यम तत्व को राधा या श्यामा कहा गया है।इसी कारण किसी मूलआनंदतत्वदर्शी ने कहा था राधे राधे श्याम मिला दे, राधा अर्थात उपरोक्त माध्यम व श्याम अर्थात मूल आनंद। पर अज्ञानवश लोगो ने इसे रटना शुरू कर दिया कि राधे राधे श्याम मिला दे।इस राधा तत्व से अनभिज्ञ होने के कारण लोगों ने इसे स्त्री या पुरुष बना कर देखना शुरू कर दिया।इसी के कारण राधा नाम के जाप का भ्रम पैदा हो गया।यही मूलतत्व सर्वोत्तम ज्ञान एवं परम सुख का दाता है। यह द्वंद्व अर्थात माया, निरंजन निराकार एवं साकार ब्रह्मांड से परे हैं । आकाश जैसा इसका स्वभाव है, क्योंकि ये परम शांत व अनंत्ता लिए हुए है।तत्वमसि में से असि पद ब्रह्म को कह गया है । तत पद ईश्वर से परे ब्रहं का लक्ष्य देते हैं। वह अचल रूप, सदा साक्षी स्वरूप हैं । स्वभाव अर्थात अध्यात्म अर्थात मूल अहम या अक्षरब्रह्म से भी परे हैं । तीनों गुण सत-रज-तम के स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महेश से परे हैं । ऐसे सतगुरु को सप्रेम नमस्कार है ।

ऋग्वेद 10.49.1

केवल एक परमात्मा ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वालों को सत्य ज्ञान का देने वाला है । वही ज्ञान की वृद्धि करने वाला और  धार्मिक मनुष्यों को श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त करने वाला है । वही एकमात्र इस  सारे संसार का रचयिता और नियंता है । इसलिए कभी भी उस एक परमात्मा को छोड़कर और किसी को भी धारण नहीं करनी चाहिए ..

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Sunday, September 9, 2018

"है" क्या है

हम स्वप्न देखते हैं। जागते ही स्वप्न ओर सत्य दोनों का आभास होता है। स्वप्न में मैं हम भागीदार भी थे और द्रष्टा भी । स्वप्न में जब तक थे, द्रष्टा भूल गया था, भागीदार ही रह गया था। अब जागकर देखता हूं कि द्रष्टा ही था, भागीदार नहीं था।
स्वप्न जैसा है, संसार भी वैसा ही है। द्रष्टा, चैतन्य ही सत्य का आभास है, शेष सब कल्पित है। जिसे हमने 'मैं' जाना है, वह वास्तविक नहीं है। उसे भी जो जान रहा है, वास्तविकता की शुरुआत है।
यह सबका द्रष्टा तत्व सबसे मुक्त और सबसे अतीत है। पर इसमें भी होना है, तभी तो दृष्टा है,, इसके पार जो है इसने न कुछ किया है, न कभी कुछ हुआ है। वह बस 'है'।

असत्य 'मैं', स्वप्न 'मैं' ओर दृष्टा में शांत हो जाये, तो 'जो है', वह प्रकट हो जाता है। इस 'है' को हो जाने देना मोक्ष है, कैवल्य है।

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Saturday, September 8, 2018

शारीरिक साधना या कष्ट से मुक्ति???

*क्या साधना में शरीर को भूखा रखना या अन्य कोई कष्ट देना सहायक हो सकता है ?*

जो किसी भी दिशा में अति करते हैं, वे मार्ग से भटक जाते हैं। एक अति से दूसरी अति पर चला जाना उसे बहुत आसान है। ऐसा उसके मनका स्वभाव ही है। शरीर के प्रति जो बहुत आसक्त है, वही व्यक्ति प्रतिक्रिया में शरीर के प्रति बहुत कठोर और क्रूर हो सकता है। इस कठोरता और क्रूरता में भी वही आसक्ति अप्रत्यक्ष रूप में बोहोत बलवती होती है। और इसलिए जैसे वह पहले शरीर से बंधा था, वैसा अब भी- बिलकुल विपरीत दिशा से शरीर से बंधा होता है। शरीर का ही चिंतन पहले था, शरीर का ही चिंतन अब भी होता है। इस भांति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है और उसकी जो मूल वृत्ति थी, उसी में रहता है। ये असंयम स्थिति है । फिर संयम किसे कहता हूं? मध्य में थिर होने का नाम संयम है। जहां संयम होता है, वहीं सुगमता है। शरीर के प्रति राग और विराग का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से संयम उपलब्ध होता है। संसार के प्रति आसक्ति और विरक्ति का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से संन्यास का संयम उपलब्ध होता है। इस भांति जो समस्त अतियों में संयम को साधता है, वह अतियों के अतीत हो जाता है । मनुष्य अतियों में जीता है और यदि अतियां न हों, तो अहम  विलीन हो जाता है। उसके कोलाहल के विलीन हो जाने पर सहज ही वह आंतरिक संगीत सुनाई पड़ने लगता है, जो कि सदा सदैव से ही स्वयं के भीतर निनादित हो रहा है। स्वयं का वह आनंद रूपी संगीत ही निर्वाण है, मोक्ष है, परम-ब्रह्मं है। ध्यान देना पानी में डूबने से के लिए आग की लपटों में स्वयं को डाल देना-बचाव का कोई मार्ग नहीं है.. दोनों ही स्थितियों में मृत्यु है ।

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Thursday, September 6, 2018

मन की साधना वर्थ

हम सारी उमर साधना के नाम पर मन को साधने मे वर्थ चली जाती हैं

पर सत्य तो मन के पार है । मन को छोड़ो तब द्वार मिलता है। सत्य मन में या मन से प्राप्त नहीं होता है। वह अ-मन की स्थिति में उपलब्ध होता है।

एक साधु साधना में था। वह अपने गुरु-आश्रम के एक एकांत झोपड़े में रहता और लगातार मन को साधने का अभ्यास करता। जो उससे मिलने भी जाते, उनकी ओर भी वह कभी कोई ध्यान नहीं देता था।
उसका गुरु एक दिन उसके झोपड़े पर गया। मात्सु ने उसकी ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। पर उसका गुरु दिन भर वहीं बैठा रहा और एक ईट पत्थर पर घिसता रहा। साधु से अंतत: नहीं रहा गया और उसने पूछा, आप क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा, 'इस ईट का दर्पण बनाना है।' साधु ने कहा- ईट का दर्पण! पागल हुए हैं- जीवन भर घिसने पर भी नहीं बनेगी। यह सुन गुरु हंसने लगा और उसने साधु से पूछा, 'तब तुम क्या कर रहे हो? ईट दर्पण नहीं बनेगी, तो क्या मन दर्पण बन सकता है? ईट भी दर्पण नहीं बनेगी, मन भी दर्पण नहीं बनेगा। मन ही तो धूल है, जिसने दर्पण को ढंका है। उसे छोड़ो और अलग करो, तब सत्य प्राप्त होता है।'

विचार संग्रह मन है और विचार बाहर से आये धूलिकण हैं। उन्हें अलग करना है। उनके हटने पर जो शेष रह जाता है, वह निर्दोष चैतन्य सदा से ही निर्दोष है। निर्विचार में, इस अ-मन की स्थिति में, उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं, साधना का साध्य वही है।

Wednesday, September 5, 2018

ज्ञानी तोता

एक फकीर द्वार पर आया है। उसके हाथ में एक तोता है। पिंजरा नहीं है, पर दिखता है कि तोता उड़ना भूल गया चुका है। आते ही फकीर नहीं, तोता ही बोला है, 'राम कहो, राम कहो, राम.. राम..राम।' मैंने कहा, 'तोता तो अच्छा बोलता है।' फकीर बोला, 'महाराज, यह तोता बड़ा ज्ञानी है!' यह सुन मुझे हंसी आ गयी। मैंने कहा, 'होना चाहिए, क्योंकि सभी ज्ञानी तोते ही होते हैं!'
यह मुझे बहुत स्पष्ट दिखता है कि ज्ञान सीखने से नहीं आता है और जो सीखने से आता है, वह ज्ञान नहीं है। ज्ञान बुद्धि की उपलब्धि नहीं है। बुद्धि से हट जाने से ज्ञान आता है। जो सीख जाता है, वह तोता बन जाता है। इस तोता-रटन का नाम ज्ञानी है।

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ज्ञान मृत तथ्यों का संग्रह है। ये तथ्य सब आधार हैं। अनुभूति में इनकी कोई जड़े नहीं होती हैं। इन मृत तथ्यों से घिरा चित्त, उसके दर्शन नहीं कर पाता है, जो कि 'है'। ये तथ्य परदा बन जाते हैं। इस परदे को हटाने पर सत्य का उदघाटन होता है। यह दर्शन ही ज्ञान है। सीखना नहीं- दर्शन ही ज्ञान है। ग्रंथ नहीं, तथ्य नहीं- सत्य-दृष्टिं उस उपलब्धि का मार्ग है। सत्य-दर्शन जब हो जाता है, तब पाया जाता है कि ज्ञान तो था ही, केवल उसे देख पाने की दृष्टिं हमारे पास नहीं थी। और, इस दृष्टिं को ज्ञान के संग्रह से नहीं पाया जा सकता ।

 इसलिए कहा है कि यह जानना कि 'मैं जानता हूं', अज्ञान है। क्यों? क्योंकि सत्य जानने पर पाया जाता है कि मैं हूं ही नहीं। केवल ज्ञान है- न ज्ञाता है, न ज्ञेय है।

यह अद्वैत दर्शन तब होता है, जब मै ओर अहम गिर जाता है, फिर जो "है" वहीं रहता है।

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Tuesday, September 4, 2018

ज्ञान क्या है

एक सत्संगी हैं। धर्म में उनकी बोहोत रुचि है। धर्म ग्रंथों के अध्ययन में जीवन लगाया है। कितने उद्धरण और कितने सूत्र उन्हें याद हैं। कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता है। वे एक चलते-फिरते विश्वकोश हैं, ऐसी ही उनकी ख्याति है। कई बार मैंने उनके विचार सुने हैं और मौन रहा हूं। एक बार उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरे संबंध में क्या ख्याल है? मैंने जो सत्य था, वही कहा। कहा कि परमात्मा के संबंध में विचार इकट्ठा करने में उन्होंने परमात्मा को गंवा दिया है। वे निश्चित ही चौंक गये मालूम हुए थे। फिर बाद में आये भी। उसी संबंध में पूछने आये थे। आकर कहा कि अध्ययन और मनन से ही तो सत्य को पाया जा सकता है। और तो कोई मार्ग भी नहीं है!
मैं ऐसे सब लोगों से एक ही प्रश्न पूछता हूं। वही उनसे भी पूछा था कि अध्ययन क्या है और उससे आपके भीतर क्या हो जाता है? क्या कोई नई दृष्टिं का आयाम पैदा हो जाता है? क्या चेतना किसी नये स्तर पर पहुंच जाती है? क्या सत्ता में कोई क्रांति हो जाती है? क्या आप जो हैं, उससे भिन्न और अन्यथा हो जाते हैं? या कि आप वही रहते हैं और केवल कुछ विचार और सूचनाएं आपकी स्मृति का अंग बन जाती हैं? अध्ययन से केवल स्मृति प्रशिक्षित होती है और मन की सतही परत पर विचार की धूल जम जाती है। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं होता है, न हो सकता है।  उससे कोई परिवर्तन नहीं होता है। चेतना वही की वही रहती है। अनुभूति के आयाम वही के वही रहते हैं। सत्य के संबंध में कुछ जानना और सत्य को जानना दोनों बिलकुल भिन्न बातें हें। 'सत्य के संबंध में जानना' बुद्धि का विषय है, सत्य को जानना चेतना का है।
सत्य को जानने के लिए चेतना की परिपूर्ण जागृति, उसकी अमूच्र्छा आवश्यक है। स्मृति-प्रशिक्षण और तथाकथित ज्ञान से यह नहीं हो सकता है।
जो स्वयं नहीं जाना गया है, वह ज्ञान नहीं है।
सत्य के, अज्ञात सत्य के संबंध में जो बौद्धिक जानकारी है, वह ज्ञान का आभास है। वह मिथ्या है और सत्य-ज्ञान में मार्ग में बाधा है। असलियत में जो अज्ञात है, उसे जानने का ज्ञात से कोई मार्ग नहीं है। वह तो बिलकुल नया है। वह तो ऐसा है, जो पूर्व कभी जाना नहीं गया है। स्मृति केवल उसे ही दे सकती है- उसकी ही कल्पना भी उससे आ सकती है- जो कि पहले भी जाना गया है। वह ज्ञात की ही पुनरावृती है।

लेकिन जो नवीन है-एकदम अभिनव, अज्ञात और पूर्व-अपरिचित- उसके आने के लिए तो स्मृति को हटाना होगा। स्मृति को, समस्त ज्ञात विचारों को हटाना होगा ताकि नये का जन्म हो सके; ताकि 'जो है' वह वैसे ही जाना जा सके जैसा कि है। मनुष्य समस्त धारणाएं और पूर्वाग्रह उसके आने के लिए हटाने आवश्यक हैं। विचार, स्मृति और धारणा-शून्य अवस्था ही अमूच्र्छा है, जागृति है। इसके आने पर ही केंद्र पर परिवर्तन होता है और सत्य का द्वार खुलता है। इसके पूर्व सब भटकन है और जीवन-भ्रम है।

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