Tuesday, October 16, 2018

सत्य पाना?

सत्य कोई वस्तु नहीं है, जिसे पाना है। वह वासना का कोई विषय नहीं है। इसलिए उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। सत्य तो तब है, जब कोई प्रवृत्ति नहीं होती। तब जो होता है, उसका नाम सत्य है। इससे सत्य को पाना नहीं है, असल में पाना ओर छोड़ना से परे सत्य है ।

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Friday, October 12, 2018

आनंद की ओर पहला कदम

विचारों से शांति आनंद की ओर पहला कदम है

सत्य की कसौटी तर्क नहीं है। सत्य की कसौटी विचार नहीं है। सत्य की कसौटी है आनंदानुभूति।  जो विचार-दर्शन है वो यहां नहीं लेकर आ सकता, ये सब विचार तो अविचार ही ज्यादा है। ज्यादातर स्त्ये मार्गी अपने अपने सत्य पर तर्क करते हैं, पर मैं उनसे कहता हूं कि जबतक ये तुम्हारे तर्क शेष हैं जब तक सत्य नही है, सत्य में प्रवेश करने पर तर्क नहीं रह जाते ।

धर्म विचार नहीं है। वह तो आनंदमय हो जाने का एक विज्ञान मात्र है। उसकी पोहोच विवाद में नहीं, प्रयोग में है। 

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Tuesday, October 9, 2018

मृत्यु के पूर्व किस मृत्यु को पा लेना है ???

परमात्मा को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी परमात्मा की सेवा को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।
 'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है,वही संन्यासी है।
'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।
'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं'
नहीं अपितु सबका 'मैं' है।

सच ही 'मैं' कहने का अधिकार केवल परमात्मा को ही है, जो कि समस्त सत्ता का केंद्र है। पर उसे 'मैं' कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके लिए सब 'मैं' ही है। कोयोंकी मै वो कहता है जिसके पास  मै से अन्य कोई वस्तु हो, इसलिए परमात्मा को मैं कहने का कारण नहीं है, और जिसे कहने का कारण है, उसे कोई अधिकार नहीं है।
पर मनुष्य अपने अनाधिकार को खोकर, अधिकार को पा सकता है। वह 'मैं' होना छोड़ कर 'मैं' हो सकता है। वह अपने अभाव से सत्य को पा सकता है। 

जो 'मैं' की इस मृत्यु से नहीं गुजरता है, वह सत्य के जीवन से वंचित रह जाता है। मैं के गिरते ही वह फासला गिर जाता है, जो कि हमें स्वयं हमसे ही तोड़े हुए था। और वह व्यक्ति धन्यभागी है, जो शरीर की मृत्यु के पूर्व इस मृत्यु को पा लेता है।

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Monday, October 8, 2018

दर्पण

हमारी मूल चेतना दर्पण की भांति ही है। अहम की धूल है, उस पर। "नहीं" का परदा है, उस पर। संस्कारों की परतें हैं, उस पर। पर मूल चेतना के स्वरूप में इससे कुछ भी नहीं हुआ है।
वह वही है। वह सदा वही है। परदा हो या न हो, उसमें कोई परिवर्तन नहीं है। सब परदे ऊपर हैं, इसलिए उन्हें खींच देना और अलग कर देना कठिन नहीं है। दर्पण पर से धूल झाड़ने से ज्यादा कठिन चेतना पर से धूल को झाड़ देना नहीं है।

आत्मा को पाना आसान है, क्योंकि बीच धूल के एक झीने परदे के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। और परदे के हटते ही ज्ञात होता है कि आत्मा ही परमात्मा है।

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Friday, October 5, 2018

बाहर ओर अंदर का अर्थ

*अंदर और बाहर का कया अर्थ है ?*

अंदर से अभीप्राय शरीर के अंदर से नही है..
अंदर का अर्थ है,आत्मा, सवंय, आनंद, परमात्मा |

बाहर का अर्थ है, अदंर से अलग जो भी है वो बाहर है जैसे,शरीर, अंतःकरण, तीन गुण, सत्ता, ये आनंद की सत्ता होने के कारण इसमें आनंद भाषित होता है पर है नही |

अविद्या कया है ?

बाहर को ही अंदर समझना अविद्या है अग्यान है..

विद्या कया है ?

अंदर व बाहर के भेद व अभेद को जान्ना ही विद्या या ग्यान है...
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Thursday, October 4, 2018

गुरु ओर परमात्मा एक कैसे है???

गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहू आकार।
आपा भेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।
(कबीर)
आत्मा, परमात्मा व गुरू एक ही हैं, ये दो नही है, अगर कोई दूसरी वस्तु है तो वह है यह शरीर व अहं | गुरू को शरीर की परिधियो में सिमित करना अल्पग्यता है गुरू और परमात्मा को अलग मान्ना अल्पग्यता है, तो गूरू कया है?
जब हम आत्मपद या आनंद की और आकृषित होते है अर्थात सत्य मार्ग की और चलते हैं तो इसे ही अंधेरे से प्रकाश की और चलनी कहते है, एक बात और ध्यान देना की अंधेरे में केवल प्रकाश के कारण ही अंधेरे हम मार्ग खोज सकते हैं, ये प्रकाश ही आनंद है यही प्रमात्मा है, और यही गुरू है, इसको पाने के लिय शरीर और अहं भाव से बाहर आना होगा, इस आकार और अहं की परिधियो का पार करना ही माने हुऐ 'आप' की भेंट कहलाता है, इसके पश्चात ही सवंय,परमात्मा या गुरू को प्राप्त कर पाओगे..
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Tuesday, October 2, 2018

क्या दुख मिटाया जा सकता है?

क्या दुख मिटाया जा सकता है?

और सारे लोग ही धीरे-धीरे ऐसी ही प्रतिमाएं होते जा रहे हें। वे सभी दुख मिटाना चाहते हैं, पर नहीं मिटा पाते हैं, क्योंकि दुख निदान जो वो कर रहे हैं वो सत्य नहीं है।
चेतना की एक स्थिति में दुख होता है। वह उस स्थिति का स्वरूप है। उस स्थिति के भीतर दुख से छुटकारा नहीं है। कारण, वह स्थिति ही दुख है। उसमें एक दुख हटायें, तो दूसरा आ जाता है। यह श्रंखला चलती जाती है। इस दुख से छूटें, उस दुख से छूटें, पर दुख से छूटना नहीं होता है। दुख बना रहता है, केवल निमित्त बदल जाते हैं। दुख से मुक्ति पाने से नहीं, चेतना की स्थिति बदलने से ही दुख समाप्त होता है- दुख-मुक्ति होती है।
एक अंधेरी रात गौतम बुद्ध के पास एक युवक पहुंचा , दुखी, चिंतित, संताप ग्रस्त। उसने जाकर कहा , 'संसार कैसा दुख है, कैसी पीड़ा है!' गौतम बुद्ध बोले थ,'मैं जहां हूं, वहां आ जाओ, वहां दुख नहीं है, वहां संताप नहीं है।'

एक चेतना है, जहां दुख नहीं है। इस चेतना के लिए ही बुद्ध बोले थे, 'जहां मैं हूं।' मनुष्य की चेतना की दो स्थितियां हैं, अज्ञान की और ज्ञान की, पर की और स्व-बोध की। मैं जब तक 'पर' से संबंध कर रहा हूं, तब तक दुख है। यह पर-बंधन ही दुख है। 'पर' से मुक्त होकर 'स्व' को जानना और स्व में होना दुख-समाप्ति है। मैं अभी स्वयं नहीं हूं, इसमें दुख है। मैं  जब समाप्त होकर केवल "है" होता है, तब दुख मिटता है।

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