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धर्म परमात्मा को पाने का नहीं, वरन् नई दृष्टिं, नई चेतना पाने का विज्ञान है। वह तो है ही, हम उसमें ही खड़े हैं, उसमें ही जी रहे हैं। पर आंखें नहीं हैं, इसलिए सूरज दिखाई नहीं देता है। ध्यान देना सूरज को नहीं, आंखों को खोजना है।
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सत्य का सहारा और आधार केवल कल्पना का धर्म, कल्पना का धाम ओर कल्पना का संसार से निवृत या शून्य से ही मिलता है। इस शून्य होने का अर्थ- कल्पनाओं के सहारों और आधारों से ही शून्य होना है।
पर यह शून्य पाने में हमें भय लगता है, भय है अधर्मी होने का ओर अपने बनाए संसार से दूर जाने का।
एक अमावस की अंधेरी रात्रि में, पर्वतीय निर्जन से गुजरते अजनबी यात्री ने पाया कि वह किसी खड्ड में गिर गया है। उसके पैर चट्टान से फिसल गये हैं और एक झाड़ी को पकड़ कर लटक गया है। चारों और अंधकार है। नीचे भी भयंकर अंधकार और खड्ड है। घंटों वह उस झाड़ी को पकड़ लटका रहा और इस समय में आने वाली मृत्यु की बहुत पीड़ा सही। सर्दी की रात्रि थी। फिर क्रमश: उसके हाथ ठंडे और जड़ हो गये। अंतत: उसके हाथों ने जवाब दे दिया। उसे उस भयंकर खड्ड में गिरना ही पड़ा। उसकी कोई चेष्टा सफल नहीं हो सकी और अपनी आंखों से स्वयं को मृत्यु के मुंह में जाते देखा। वह गिरा, पर गिरा नहीं। वहां खड्ड था ही नहीं। गिरते ही उसने पाया कि वह जमीन पर खड़ा है।
ऐसे ही मैंने भी पाया है। शून्य में गिरकर पाया कि शून्य ही भूमि है। चित्त के सब आधार जो छोड़ देता है, वह सत्य का आधार पा जाता है। शून्य होने का पुरुषार्थ ही एकमात्र पुरुषार्थ है और जो शून्य होने की शक्ति नहीं जुटा पाता है, वे 'शून्य' ही बने रह जाते हैं।
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*सन्यास एक रहस्य का बोध है, जिसने यह रहस्य जान लिया वह सन्यासी है, फिर चाहे उसके वस्त्र व रहन सहन कैसा भी हो, ओर जो इस रहस्य से दूर है, वह सन्यासी के वस्त्र पहन कर भी सन्यासी नहीं है ।*
'मैं जगत में हूं और जगत में नहीं भी हूं' - ऐसा जब कोई अनुभव कर पाता है, तभी जीवन का रहस्य उसे ज्ञात होता है। जगत में दिखाई पड़ना एक बात है, जगत में होना बिलकुल दूसरी। जगत में दिखलाई पड़ना आत्म ज्ञान है, जगत में होना अज्ञान है। जब-तक जीवन है, तब तक शरीर जगत में होगा ही। लेकिन, जिसे 'उस' जीवन को जान लिया हो- जिसका कि कोई अंत नहीं आता है- उसके अंदर से जगत समाप्त हो जाता है।
एक संन्यासी ने सुना कि देश का सम्राट परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया है। उस संन्यासी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्या यह संभव है कि जिसने कुछ भी नहीं त्यागा है, वह परमात्मा को पा सके? वह संन्यासी राजधानी पहुंचा और राजा का अतिथि बना। उसने राजा को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा, स्वर्ण पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करते देखा- रात्रि में संगीत और नृत्य का आनंद लेते हुए भी। उसका संदेह अनंत होता जा रहा था। वह तो सर्वथा स्तब्ध ही हो गया था।
रात्रि किसी भांति बीती। संन्यासी संदेह और चिंता से सो भी नहीं सका। सुबह ही राजा ने नदी पर स्नान करने के लिए उसे आमंत्रित किया। राजा और संन्यासी नदी में उतरे। वे स्नान करते ही थे कि अचानक उस शांत, निस्तब्ध वातावरण को एक तीव्र कोलाहल ने भर दिया- आग, आग, आग! नदी तट पर खड़ा राजमहल धू-धूकर जल रहा था और उसकी लपटें तेजी से घाट की ओर बढ़ रही थीं। अपना कौपीन बचाने के लिए संन्यासी ने स्वयं को सीढि़यों की ओर भागते हुए पाया। उसे स्मरण ही न रहा कि साथ में सम्राट भी है। लेकिन लौटकर देखा, तो पाया कि राजा जल में ही खड़े हैं और कह रहे हैं : ''हे मुनि, यदि समस्त राज्य भी जल जावे, तो भी मेरा कुछ भी नहीं जलता है।'' सम्राट थे जनक और मुनि थे शुकदेव।
लोग मुझ से पूछते हैं : योग क्या है? मैं उनसे कहता हूं : अस्पर्श भाव। स्वयं में प्रतिष्ठित चेतना बाह्य अस्पर्शिता होती है, यही सन्यास है । ओर जो चतना स्वयं में नहीं होती वहीं दर दर भटकती रहती है, वहीं जन्म ओर मृत्यु को प्राप्त होती है ।
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सत्य की ओर जीवन क्रांति अत्यंत द्रुत गति से करनी होती है- कभी भी ये ना सोचो की हम सब परिवर्तन धीरे धीरे कर लेंगे, जो भी करना चाहते हो वो आज ही अभी कर दो फिर- विद्युत की चमक की भांति ही जीवन बदल जाता है।
कुछ लोग एक व्यक्ति को साधू के पास लाए थे। उन्हें कोई दुर्गुण पकड़ गया था। उसके प्रियजन चाहते थे कि वे उसे छोड़ दें। उस दुर्गुण के कारण उनका पूरा जीवन ही नष्ट हुआ जा रहा था। साधू ने उनसे पूछा कि क्या विचार है? वे बोले, ''मैं धीरे-धीरे उसका त्याग कर दूंगा।'' यह सुन साधू हंसने लगा था और उनसे कहा था, ''धीरे-धीरे त्याग का कोई अर्थ नहीं होता है। कोई मनुष्य आग में गिर पड़ा हो, तो क्या वह उससे धीरे-धीरे निकलेगा? और, यदि वह कहे कि मैं धीरे-धीरे निकलने का प्रयास करूंगा, तो इसका क्या अर्थ होगा? क्या इसका स्पष्ट अर्थ नहीं होगा कि उसे स्वयं आग नहीं दिखाई पड़ रही है?''
परमहंस रामकृष्ण की सत्संगति से एक धनाढ्य युवक बहुत प्रभावित था। वह एक दिन परमहंस देव के पास एक हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने लाया। रामकृष्ण ने उससे कहा, ''इस कचरे को गंगा को भेंट कर आओ।'' अब वह क्या करे? उसे जाकर वे मुद्राएं गंगा को भेंट करनी पड़ीं। लेकिन वह बहुत देर से वापस लौटा , क्योंकि उसने एक-एक मुद्रा गिनकर गंगा में फेंकी! एक-दो- तीन- हजार - स्वभावत: बहुत देर उसे लगी। उसकी यह दशा सुनकर रामकृष्ण ने उससे कहा था, ''जिस जगह तू एक कदम उठाकर पहुंच सकता था, वहां पहुंचने के लिये तूने व्यर्थ ही हजार कदम उटाये।''
सत्य को जानने की ललक में अगर तुम आगे बढ़ना चाहते हो तो किसी भी बात का त्याग धीरे-धीरे नहीं करना होता है। अगर धीरे है तो तुममें ललक नहीं है । जो भी करना ह एक झ्टके में करदो, धीरे धीरे का कोई अर्थ नहीं है।
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मन से धूल नहीं हटानी, मन को साफ नहीं करना, मन ही तो धूल है, जिसने दर्पण को ढंका है। उसे छोड़ो और अलग करो, तब सत्य प्राप्त होता है।'
विचार संग्रह मन है और विचार बाहर से आये धूलिकण हैं। उन्हें अलग करना है। उनके हटने पर जो शेष रह जाता है, वह निर्दोष चैतन्य सदा से ही निर्दोष है। निर्विचार में, इस अ-मन की स्थिति में, उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं, साधना का साध्य वही है।
न 'स्व' आत्मा है, न 'पर' आत्मा है। यह द्वैत वैचारिक है। यह द्वैत मन में है। मन आभास सत्ता है। वह कभी वर्तमान में नहीं होता है। वह या तो अतीत में होता है, या भविष्य में। न अतीत की सत्ता है, न भविष्य की। एक स्मृति में है, एक कल्पना में है। सत्ता में दोनों नहीं हैं।
इसअसत्ता से 'मैं' का जन्म होता है। 'मैं' विचार की उत्पत्ति है। काल भी विचार की उत्पत्ति है। विचार के कारण, 'मैं' के कारण, आत्मा आवरण में है। वह है, पर खोयी मालूम होती है। फिर यही 'मैं' यही विचार-प्रवाह इस तथाकथित खोयी आत्मा को खोजने चलता है। यह खोज असंभव है, क्योंकि इस खोज से 'मैं' और पुष्ट होता है- सशक्त होता है।
'मैं' के द्वारा आत्मा को खोजना, स्वप्न के द्वारा जागृति को खोजने जैसा है। *'मैं' के द्वारा नहीं, 'मैं' के विसर्जन से उसको पाना है।* स्वप्न के जाते ही जागृति है, 'मैं' के जाते ही आत्मा है। आत्मा आनंद है, क्योंकि पूर्णता है। उसमें 'स्व', या 'पर' नहीं है। वह अद्वैत है। वह कालातीत है। विचार के, मन के जाते ही जाना जाता है कि उसे कभी खोया नहीं था।
इसलिए उसे खोजना नहीं है। खोज छोड़नी है और खोजने वाले को छोड़ना है। खोज और खोजी के मिटते ही खोज पूरी हो जाती है। 'मैं' को खोकर उसे पा लिया जाता है।
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