Monday, August 31, 2015



माया के इस लुभावने खेल को देखकर साधू-सन्त प्रत्यक्ष रुप से सावधान करते हैं। तुम इसमें बाह्य रुप से रहते हुए भी आन्तरिक रुप से अलग ही रहो, जिससे तुम्हें माया के अथाह बन्धनों से छुटकारा मिल सके।  बार-बार इस प्रकार का उत्तम समय नहीं आने वाला है और न कोई तुम्हें इस प्रकार बोल- बोलकर समझायेगा। ज्ञान द्वारा प्रबोधित होने के पश्चात् तुम सबके सत्य कथनों के सार तत्व को ग्रहण करो।  उस सार का भी सार यह है कि उस सच्चिदानन्द परब्रह्म के चरणों से ही अपना अटूट बन्धन बांधो और उनके अखण्ड प्रेम तथा आनन्द में हमेशा डूबे रहो। माया के कार्यों को करते हुए भी माया में लिप्त न हो। इसका परिणाम यह होगा कि संसार को छोड़ते समय हृदय में माया की चाहना नहीं रहेगी।

प्रणाम जी 
पुराण संहिता के अध्याय २६ श्लोक ८०,८१,८२ में  सुन्दर वर्णन है-                        

   बारह हजार सखियां, जो अक्षरातीत की अंगना हैं, माया का खेल देखने की इच्छा से इनकी मनोवृत्ति (सुरता) गोकुल में गई । वे गोपों के घरेलू कार्यों को करती हुई वहीं स्थित हो गईं । तथा माया जनित मिथ्या धारणा के अधीन होने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप की खोज से रहित हो गईं । मूल मिलावा में विराजमान अक्षरातीत की वे प्रियायें अपने स्थानों पर बैठी ही रहीं । अक्षरातीत के सामने समूहबद्ध बैठी हुईं ही वे सपने के खेल में मोहित हो गईं ...

प्रणाम जी

Sunday, August 30, 2015

सत्य के व्यापारियों

सुप्रभात जी

सत्य के व्यापारियों अर्थात् परब्रह्म को पाने की राह पर कदम बढ़ाने वालों ! मैं आपको एक बात समझा कर कह रहा हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनिए । यह संसार बाजीगर के खेल की तरह माया का ऐसा फन्दा है, जिसमें हर कोई उलझा हुआ है । इस माया ने जीव को तृष्णा की गांठ देकर मौत की फांसी लगा रखी है । साथ ही विषयों में उल्टा लटका रखा है। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, तथा मत्सर (ईर्ष्या) के अनेकों बन्धनों से इस प्रकार बांध दिया गया है, जिसे कोई भी खोल नहीं पाता है ..सावधान रहो ये माया बहोत ठगनी है तुम इसके तामसिक और राजसी रूप से तो किसी तरह पार पा लोगे पर  इसका सात्विक रूप बहोत भूलभुलयीया है जिस से पार पाना बहौत कठिन है..

प्रणाम जी

दिव्य ब्रह्मपुर धाम है , घर अक्षरातीत निवास ।

निजानन्द है सम्प्रदा , ए उत्तर प्रस्न प्रकास ।।

ब्रह्मसृष्टियों का धाम दिव्य ब्रह्मपुर (परमधाम) है, जो क्षर व अक्षर से परे स्थित है । उस परमधाम का कण-कण तेज, सुगन्धि, चेतनता और आनन्द से परिपूर्ण है । वही धाम अक्षरातीत व ब्रह्मसृष्टियों के मूल तनों (परआतम) का असल निवास है । यहां के कण-कण में अक्षरातीत का स्वरूप विराजमान होने से इसे स्वलीला अद्वैत कहा जाता है ।

जो सर्वज्ञ, सबको जानने वाला ब्रह्म है, जिसकी महिमा जगत में है, निश्चित रूप से वह ब्रह्म अमृतस्वरूप दिव्य ब्रह्मपुर में स्थित है । (मुण्डक. २/२/७-३९)

उपरोक्त पद्धति को मानने वाला समुदाय ही 'श्री निजानन्द सम्प्रदाय' कहलाता है ..(याहां ये जान्ना आवयश्क है की बृह्म को कभी भी समप्रदाय में नही बांधा ता सकता लेकीन कयोंकी जीवों को पद्धति बताई गई है इसलिय उनकी भाषा मे सम्प्रदाय शब्द का परयोग किया गया है)  ब्रह्मसृष्टियों के लिय सम्प्रदाय जैसी कोइ सीमा नही होती कयोंकी वो अखंड और अनंत आनंद के धाम से आई है इसलिय उनके हृदय मे सम्प्रदाय जैसी संकिर्ता नही आती इनके भाव हर क्षेत्र में  अन्नत और संकिर्ता से परे ही होते है ..इसलिय  इनका प्रवर्तन सच्चिदानन्द परब्रह्म की आह्लादिनी शक्ति श्री श्यामा जी ने किया है ।

प्रणांम जी
कामी अनन्त बार मरता है जितनी कामना उतनी बार मृत्यु | क्योंकि जितनी बार कामना उतनी बार जन्म | जीवात्मा की हर कामना एक जन्म बन जाती है | जैसे जंग लोहे से उत्पन्न हो कर उसी को खाते है, उसी प्रकार साधनात्मक अनुशासन का उल्लघंन करने वाले मनुष्य के कर्म उसे दुर्गति को पहुंचाते है ..

प्रणाम जी

Saturday, August 29, 2015



हे मेरी आत्मा ! तूं इस झूठे संसार को देख रही है, इसलिये तुम्हारे और परमात्मा के बीच अलगाव का आभास हो रहा है। वस्तुतः वे तो तुमसे रंच मात्र भी अलग नहीं है, बल्कि शाहरग (प्राण नली) से भी अधिक निकट हैं। माया की इच्छा के कारण तुमने ही अपने और परमात्मा के बीच में परदा कर लिया है। तारतम ज्ञान के प्रकाश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आत्मा और परमात्मा के बीच किसी भी प्रकार का भेद नहीं है।

प्रणाम जी

बोले चाले पर कोई न पेहेचाने, परखत नहीं परखानो ।
महामत कहें माहें पार खोजोगे, तब जाए आप ओलखानो ।।

अनेक लोगोंने परमात्माके विषयमें ज्ञाानोपदेश दिया तथा अनेक लोगोंने परमात्माकी प्राप्तिके लिए साधनाएँ भी कीं किन्तु किसीने भी उन्हें नहीं पहचाना. इस प्रकार प्रयत्न करनेपर भी पहचान योग्य परब्रह्म परमात्मा पहचाने नहीं गए. शंकराचार्य जी कहते हैं कि किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी , जिसमें श्रुति के सिद्धान्त का ज्ञान होता है , ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढ़ बुद्धि अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता है , वह असत् ( जड़ प्रकृति ) में आस्था रखने के कारण अपने को नष्ट करता है और निश्चय ही वह आत्मघाती है । ( विवेक चूड़ामणि ४ ) इसलिय अन्तर्मुख होकर जब परम तत्त्वको ढूँढोगे, तब आत्मा और परमात्माकी स्वतः पहचान हो जाएगी..यही जीवन की सार्थकता है और मानव जीवन का परम और एकमात्र लक्षय ...

प्रणाम जी