Saturday, November 21, 2015

खेल खेलने लगोंगे तो ..

सुप्रभात जी

वास्तवमें संसार तो खेल ही होता है । अगर हम इसे खेल समझकर खेल खेलने लगोंगे तो  हार जीतकी कामना नहीं रहेगी इसलिए हम हर्ष और शोकसे ऊपर उठ जायेंगे ।  इसे खेल समझ कर देखने लगेंगे तो हर्ष-शोकसे रहित होकर आनन्दका अनुभव होगा । ब्रह्मात्माएँ द्रष्टा होनेसे ममत्त्व और परत्त्वका आरोप किए बिना ही माया मोहमें अलिप्त होकर उनको यह खेल देखना चाहिए । मायाके झूठे जीव ही छल कपटका साहरा लेकर झूठी सम्पत्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहते हैं । यदि वह सम्पत्ति या प्रतिष्ठा मिल भी जाय तो भी शरीर छूटने पर तो वह छूट ही जायेगा । इसलिए अपने परमात्माको छोड़ कर मायाके पीछे दौड़ना नहीं चाहिए । यद्यपि शरीर रहने तक माया का भी महत्त्व रहता है, सारे लौकिक कार्य लौकिक सम्पत्तिके द्वारा ही सम्पन्न होंगे तथापि मायाके साधनोंसे हमारी तृप्ति नहीं होगी । हमारी (आत्माकी)भूख मायाके आहारसे शान्त नहीं होगी इसके लिए तो जागृत होकर धाम और परमात्माका आश्रय लेना ही पडेगा । आत्मामें जागृति आते ही हमें अनुभव होगा कि हम परमात्मा से दूर नहीं अपितु उनके ही चरणोंमें रह कर मायाका खेल देख रहे हैं |for more click this link👇👇👇
Satsangwithparveen.blogspot.com
प्रणाम जी

वाणी..

सुख हक इस्क के, जिनको नाहीं सुमार।
सो देखन की ठौर इत है, जो रूह सों करो विचार।।

परमधाम में परमात्मा के प्रेम का अनन्त आनन्द है, किन्तु हे साथ जी ! यदि आप अपनी आत्मिक दृष्टि से विचार करें तो उन सुखों की पहचान इस  ब्रह्माण्ड में ही होनी है।
परमधाम में  प्रेम और आनन्द का विलास है, किन्तु इस  ब्रह्माण्ड में तारतम ग्यान के प्रकाश में हम अपने ज्ञान चक्षुओं से इश्क और आनन्द के शुक्ष्म भेद को जान सकते हैं। ध्यान( चितवनि )द्वारा अष्ट प्रहर की लीला सहित सम्पूर्ण पक्षों का शुक्ष्म का भी  शुक्ष्म भेद जान सकते हैं और उस अवस्था को जान सकते हैं जिसमें आत्मा और परात्म में भेद नहीं रह जाता...

प्रणाम जी

Friday, November 20, 2015

साधक को श्रवण मनन से संतुष्ट नहीं होना चाहिए


अधिकतर लोग यह समझते है की शास्त्र अध्ययन ,सत्संग आदि से आत्म ज्ञान की प्राप्ति होती है .
शास्त्रों के अनुसार पहले सत्य का श्रवण करना चाहिए ,शास्त्र अध्ययन ,सत्संग करना चाहिए .
फिर उसका मनन करना चाहिए ताकि संशय की निवृति हो एवं बौद्धिक रूप से तत्व की समझ हो ,स्पष्टता हो .
किन्तु इतनी सी बात से जीवन में परिवर्तन नहीं आता है ,मोक्ष नहीं होता है ,मन से मुक्ति नहीं होती है .
इसीलिए शास्त्र आगे कहते है कि श्रवण मनन पर्याप्त नहीं है ,आपको इसके आगे ध्यान [निदिध्यासन ] भी करना होगा ,अन्यथा
आत्म साक्षात्कार या मुक्ति नहीं होगी .शास्त्र का कहना है कि ध्यान -समाधी के बिना मुक्ति या साक्षात्कार संभव नहीं है.
अतः साधक को श्रवण मनन से संतुष्ट नहीं होना चाहिए ,साथ में ध्यान भी करना चाहिए .

Thursday, November 19, 2015

करनी माफक कृपा..

करनी माफक कृपा..
सुप्रभात जी
(satsangwithparveen.blogspot.com)
(www.facebook.com/kevalsudhsatye)

तिलों और तेल में कुछ भेद नहीं तैसे ही परमात्मा  और आत्मा में कुछ भेद नहीं । जो परमात्मा है वह आत्मा है और जो आत्मा है वह परमात्मा है, परमात्मा और आत्मा दोनों एक वस्तु के नाम हैं, जैसे विटप और पादप दोनों एक वृक्ष के नाम हैं ।   विचार से रहित को परमात्मा भी ज्ञान नहीं दे सकता । आत्मा के साक्षात्कार में मुख्य कारण अपने पुरुषार्थ से उपजा विचार है इसलिय तू मुख्य कारण का आश्रय कर ।
प्रथम पाँचों इन्द्रियों को वश कर और चित्त को आत्मविचार में लगा । जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अपने पुरुषार्थ से होता है, पुरुषार्थ बिना नहीं होता । अपने पुरुषार्थ प्रयत्न से इन्द्रियरूपी पर्वत को लाँघे तो फिर संसारसमुन्द्र से तर जावे और तब परमपद की प्राप्ति हो । जो पुरुष के प्रयत्न बिना परमात्मा मुक्ति दें तो मृग पक्षियों को क्यों दर्शन देकर उद्धार नहीं करता जो गुरु अपने पुरुषार्थ बिना उद्धार करते तो अज्ञानी अविचारी ऊँट, बैल आदिक पशुओं को क्यों नहीं कर जाते ।  अपने मन के स्वस्थ किये बिना परम सिद्धता की प्राप्ति महात्मा पुरुष नहीं जानते । जिन्होंने वैराग्य और अभ्याससे इन्द्रियरूपी शत्रु वश किये हैं वे अपने आपसे उसको पाते हैं और किसी से नहीं पाते । हे जिवों! आपसे अपनी आराधना और अर्चना करो,आत्मत्तव की खोज करो, आपसे आपको देखो और आपसे आपमें (आत्मा )स्थित रहो । कयोंकी जो परमात्मा है वह आत्मा है और जो आत्मा है वह परमात्मा है..इसलिय अपने आप मे रह कर जो करनी करोगे तो अपने में से ही परमात्मा कृपा करेंगे...
वदन्तुशास्त्राणि यजन्तु देवान् कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तुदेवता:।
आत्मैक्यबोधेनविना विमुक्तिर्न सिध्यतिब्रम्हशतान्तरेsपि।।
(विवेक चूड़ामणि--६)

‘भले ही कोई शास्त्रों की व्याख्या करे, इष्टदेव का भजन करे, नाना शुभ कर्म करे अथवा इष्टदेव को भजे, तथापि जब तक आत्मा और परमात्मा की एकता का बोध नहीं होगा, तब तक सौ ब्रम्हा के बीत जाने पर भी (अर्थात् सौ कल्प में भी) मुक्ति नहीं हो सकती।
तावत्तपो व्रतं तीर्थं जप होमार्चनादिकम्।
वेदशास्त्रागम कथा यावत्तत्त्वं न विन्दति।।
(गरुड़ पुराण १६/९८)
तब तक ही तप, व्रत, तीर्थाटन, जप, होम और देवपूजा आदि हैं तथा तब तक ही वेदशास्त्र और आगमों की कथा है जब तक कि तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता;आत्मा परमात्मा का ग्यान( परमतत्त्वज्ञान ) प्राप्त होने पर ये सब कुछ भी नहीं रह जाते हैं..
पहले आप पहचानो रे साधो ..(वाणी)
प्रणाम जी

Wednesday, November 18, 2015

तू देह में अहं अहं करता है...


सुप्रभात जी

हे मूर्ख मन! जो तू देह में अहं अहं करता है सो तेरा अहं किस अर्थ का है । अंगुष्ठा से लेकर मस्तक पर्यन्त अहं वस्तु कुछ नहीं ।
यह शरीर तो अस्थि, माँस और रक्त का थैला है । यह पञ्चतत्त्वों का जो शरीर बना है उसमें अहंरूप वस्तु तो कुछ नहीं है । हे मूर्ख मन! तू अहं अहं क्यों करता है? यह जो तू कहता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ मैं स्पर्श करता हूँ, मैं स्वाद लेता हूँ और इनके इष्ट-अनिष्ट में रागद्वेष से जलता है सो वृथा कष्ट पाता है ।

रूप को नेत्र ग्रहण करते हैं, नेत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं और तेज का अंश उनमें स्थित है जो अपने विषय को ग्रहण करता है, इसके साथ मिलकर तू क्यों तपायमान होता है?

शब्द आकाश में उत्पन्न हुआ है और आकाश का अंश श्रवण में स्थित है जो अपने गुण शब्द को ग्रहण करता है इसके साथ मिलकर तू क्यों रागद्वेष कर तपायमान होता है?

स्पर्श इन्द्रिय वायु से उत्पन्न हुई है और वायु का अंश त्वचा में स्थित है वही स्पर्श को ग्रहण करता है, उससे मिलकर तू क्यों रागद्वेष से तपायमान होता है?

रसना इन्द्रिय जल से उत्पन्न हुई है और जल का अंश जिह्वा है जो अग्रभाग में स्थित है वही रस ग्रहण करती है, इससे मिलकर तू क्यों वृथा तपाय मान होता है?

और घ्राण इन्द्रिय गन्ध से उपजी है और पृथ्वी का अंश घ्राण में स्थित है वही गन्ध को ग्रहण करती है, उसमें मिलकर तू क्यों वृथा रागद्वेषवान् होता है?

मूर्ख मन! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं पर तू इनमें अभिमान करता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ और रस लेता हूँ । यह इन्द्रियाँ अपने विषय को ग्रहण करती हैं और के विषय को ग्रहण नहीं करती कि नेत्र देखते हैं श्रवण नहीं करते और कान सुनते हैं देखते नहीं इत्यादिक । सब इन्द्रियाँ अपना धर्म किसी को देती भी नहीं और न किसी का लेती हैं । वे अपने धर्म में स्थित हैं और विषय को ग्रहण कर इनको रागद्वेष कुछ नहीं होता । इनको ग्रहण करने की वासना भी कुछ नहीं होती और तू ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मानकर रागद्वेष से जलता है । जो तू भी राग द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे तो तुझको दुःख कुछ न हो ।
और कर्मबन्धन भी न हो...

प्रणाम जी

आत्मा और जीव

भी बेवरा वासना जीव का , याके जुदे जुदे हैं ठाम ।
जीव का घर है नींद में , वासना घर श्री धाम ।।

आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि इनके मूल घर अलग-अलग हैं । जीव का मूल घर नींद (निराकार) में है तथा आत्मा का मूल घर परब्रह्म का अनादि एवं अखण्ड परमधाम है ।आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि झूठा जीव स्वप्न से उत्पन्न होने के कारण नींद (निराकार) को पार नहीं कर पाता । जबकि आत्मायें निराकार एवं अक्षरधाम को भी पार करके अपने मूल घर अखण्ड परमधाम में पहुँच जाती हैं ।
श्रुति के कथनानुसार नारायण ही जीवों के साक्षात् परब्रह्म हैं और जीव उनका प्रतिभास रूप हैं। जीव स्वतन्त्र नही हैं, अपितु पराधीन हैं । वे मोह, अविद्या और अहंकार से ही बने हैं और जन्म-मरण एवं सुख-दुःख (कर्मफल भोग) के चक्र में ही फँसे रहते हैं । जीव माता के गर्भ में प्रवेश करता है । मनुष्य शरीर के अतिरिक्त जीव अनेक योनियों में भी शरीर (जीवन) धारण करता है । नारायण का स्वप्न टूटते ही अर्थात् महाप्रलय होते ही जीव उनमें समा जाते हैं ।
आत्मा अनादि और अखण्ड है । वह कभी गर्भ में नहीं आती, अपितु जन्म के पश्चात् ही शरीर में प्रवेश करती है । आत्मा कभी भी मनुष्य तन के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में शरीर धारण नहीं करती । परब्रह्म का स्वरूप होने से वह प्रेम व आनन्द में मग्न रहती हैं । वे एक क्षण के लिए भी उनसे अलग नहीं हो सकती |

प्रणाम जी

Tuesday, November 17, 2015

अरे मन !

अरे मन ! तू परमात्मा का गुणगान क्यों नहीं करता ? इस भूल भुलैया के खेल वाले संसार में तू क्यों धोखा खा रहा है ? मुक्ति एवं भुक्ति ये दोनों अत्यन्त प्रबल चुड़ैलें हैं, तू इनके चक्कर में क्यों आ रहा है | स्त्री, पुत्र, धन, यह तीनों तिजारी के समान हैं | तू इनको क्यों अपना रहा है ? इन इन्द्रियों के विषयों को पीकर तू क्यों इतना सुख मान रहा है ?  यह मनुष्य का शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है | यह चार दिन का जीवन जा रहा है, अतएव शीघ्र ही परमात्मा का ध्यान कर |

प्रणाम जी