Sunday, January 31, 2016

सतसंग

सुप्रभात जी

जब हम परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं तो कोई भी सांसारिक वस्तु इस लायक नहीं प्रतीत होती कि उससे प्रेम किया जाए। जिस प्रकार चातक को यह विश्वास होता है कि स्वाति नक्षत्र में बरसे जल से ही उसकी पिपासा शान्त होगी, तब चातक पक्षी पावस में गिरने वाली ओस की पहली बूंदों का प्यासा हो जाता है तो उसे न तो तूफान का भय होता है और न ही बादलों की गर्जना का। इसी प्रकार साधक को भी ऎसी प्यास उत्पन्न हो जाये तो परमात्मा की प्राप्ति सुलभ हो जाती है, यदि एक बार परमात्मा सानिध्य का स्वाद चख लिया तो फिर उसे संसार की सभी वस्तुयें स्वत: ही बेजान और बेस्वाद लगने लगती हैं। तब सांसारिक सुख-दुख की धारणा मिट जाती है, तब वह परम-आनन्द को प्राप्त कर सभी प्रकार से मुक्त हो जाता हैं।

प्रणाम जी

हद बेहद विवरण

हद पार बेहद है , बेहद पार अछर ।
अछर पार वतन है , जागिए इन घर ।। (प्र. हि. ३१/१६५)

•यह हद का ब्रह्माण्ड जिसमे 14 लोक व निराकार तक का विस्तार आता है यह सब लय होने वाला है इसलिय इसे हद काहा है ..
श्रीमद् भागवतम के द्वतीय स्कन्ध के पाँचवे अध्याय में इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत 14 भुवनों या लोकों का वर्णन किया गया है |

उपरी या ऊर्ध्व लोक: 1.भूर्लोक (प्रथ्वी),  2.भुवर्लोक (राक्षस तथा भूत पिशाच),  3.स्वर्गलोक, 4. महर्लोक (भृगु महिर्षि),  5. जनः लोक (सप्त ऋषि),  6. तपः लोक  तथा  7. सत्यलोक (ब्रह्मा ,विष्णू,महेश) |

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार ध्रुवलोक सूर्य से 38 लाख योजन ऊपर स्थित है | ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक और इससे 2 करोड़ योजन ऊपर जनस लोक, फिर इससे ऊपर 8 करोड़ योजन ऊपर तपोलोक और इससे भी 12 करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक स्थित है | इस प्रकार सूर्य से सत्यलोक की दूरी 23,38,00,000 योजन या 1,87,04,00,000 मील है | सूर्य से प्रथ्वी की दूरी 1 लाख योजन है | प्रथ्वी से 70,000 योजन नीचे अधोलोक या निम्न लोक शुरू होते हैं (SB.5.23.9 तात्पर्य) |

सात अधोलोक: यहाँ सूर्य का प्रकाश नही जाता, अतः काल दिन या रात में विभाजित नही है पर यह भी महाप्रलय में लीन होने वाला है | (SB.5.24.11) |

1.अतल - मय दानव का पुत्र बल नाम का असुर जिसने 96 प्रकार की माया रच रखी है | कुछ तथाकथित योगी तथा स्वामी आज भी लोगों को ठगने के लिए इस माया का प्रयोग करते हैं  (SB.5.24.16) |

2.वितल - स्वर्ण खानों के स्वामी भगवान् शिव अपने गणों, भूतों, तथा ऐसे ही अन्य जीवों के साथ रहते है और माता भवानी के साथ विहार करते हैं (SB.5.24.17) |

3.सुतल - महाराज विरोचन के पुत्र महाराज बलि आज भी श्री भगवान् की आराधना करते हुए निवास करते हैं तथा भगवान् महाराज बलि के द्वार पर गदा धारण किये खड़े रहते हैं (SB.5.24.18) |

4.तलातल - यह मय दानव द्वारा शासित है जो समस्त मायावियों के स्वामी के रूप में विख्यात है (SB.5.24.28) |

5.महातल - यह सदैव क्रुद्ध रहने वाले अनेक फनों वाले कद्रू की सर्प-संतानों का आवास है जिनमे कुहक, तक्षक, कालिय तथा सुषेण प्रमुख हैं (SB.5.24.29) | ,

6.रसातल - यहाँ दिति तथा दनु के आसुरी पुत्रों का निवास है, ये पणि, निवात-कवच, कालेय तथा हिरण्य-पुरवासी कहलाते हैं | ये देवताओं के शत्रु हैं और सर्पों के भांति बिलों में रहते हैं (SB.5.24.30) |  

7.पाताल – यहाँ अनेक आसुरी सर्प तथा नागलोक के स्वामी रहते हैं, जिनमे वासुकी प्रमुख है | जिनमे से कुछ के पांच, सात, दस, सौ और अन्यों के हजार फण होते हैं | इन फणों में बहुमूल्य मणियाँ सुशोभित हैं जिनसे अत्यन्त तेज प्रकाश निकलता है (SB.5.24.31) |

पाताल लोक के मूल में भगवान् अनन्त अथवा संकर्षण निवास करते हैं, जो सदैव दिव्य पद पर आसीन हैं तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किये रहते हैं | भगवान् अनन्त सभी बद्धजीवों के अहं तथा तमोगुण के प्रमुख देवता हैं तथा शिवजी को इस भौतिक जगत के संहार हेतु शक्ति प्रदान करते हैं (SB.5.25) |

ब्रह्मांड की माप पचास करोड़ योजन है तथा इसकी लम्बाई व चौड़ाई एकसमान है (आदि लीला 5.97.98) | प्रत्येक लोक का अपना एक विशेष वायुमंडल होता है और यदि कोई भौतिक ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत किसी विशेष लोक की यात्रा करना चाहता है तो उस व्यक्ति को उस लोक- विशेष के अनुसार अपने शरीर को अनुकूल बनाना होता है | भौतिक ब्रह्माण्ड के इन उच्चतर लोकों में जाने के लिए मनुष्य को मन तथा बुद्धि अर्थात सूक्ष्म शरीर को त्यागना नही पड़ता, उसे केवल प्रथ्वी, जल, अग्नि इत्यादि से बने स्थूल शरीर को ही त्यागना होता है ||

गीता (8.16) में भगवान् कृष्ण कहते हैं: इस जगत में सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम सारे लोक दुखों के घर हैं जहाँ जन्म तथा मृत्यु का चक्कर लगा रहता है, किन्तु जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है वह फिर कभी जन्म नहीं लेता |

•इस हद के ब्रह्माण्ड से परे बेहद का मण्डल है । इसके अन्तर्गत अक्षर ब्रह्म के चारों पाद सत्स्वरूप , केवल , सबलिक और अव्याकृत हैं ।
वेद के कथनानुसार- यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म के चौथे पाद (अव्याकृत) द्वारा बना है । इसके तीनों पाद चेतन , प्रकाशमय और अखण्ड हैं । परब्रह्म का स्वरूप इन तीनो पादों से भी परे उस स्थान पर है , जिसे परमधाम ( दिव्य ब्रह्मपुर ) कहते हैं

•मूल तत्व सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत हैं , जो अक्षर से भी परे हैं ।उनके हारे में कहा है की..
परब्रह्म सर्वव्यापक अवश्य है किन्तु अपने निजधाम में , जहाँ के कण-कण में अनन्त सूर्यों का प्रकाश है , जहाँ अनन्त आनन्द है (ऋग्वेद ९/११३/७) ।

गीता में भी कहा गया है कि उस ब्रह्मधाम में न तो सूर्य प्रकाशित होता है न चन्द्रमा और न अग्नि ही । जहाँ जाने पर पुनः लौटना नहीं पड़ता वह मेरा परमधाम है ।

प्रकृति के अन्धकार से सर्वथा परे सूर्य के समान प्रकाशमान स्वरूप वाले परमात्मा को मै जानता हूँ , जिसको जाने बिना मृत्यु से छुटकारा पाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है (यजुर्वेद ३१/१८) ।

प्रणाम जी

Saturday, January 30, 2016

अन्नत आनंद

सुप्रभात जी
Satsangwithparveen.blogspot.com
भिन्न भिन्न प्रकार के नशे अलग अलग आनंद देते हैं . जो की विभिन्न मादक पदार्थो के माध्यम से किय जाते हैं. ये पदार्थ हमारे अन्दर जाके कुछ कोशिकाओं व नाडी तंत्र के साथ क्रिया करके शरीर मे आनंद को क्रियानवित कर देते हैं जिस कारण हमें कुछ समय के लिय आनंद का अनुभव होता है.. और जिसको इन मादक पदार्थों की लत पड जाती है वो फिर अन्य किसी भी प्रलोभन में आकर इनको नही त्यागना चाहता ,वो इनके लिय हर प्रकार के भोग विलास को त्याग देता है..
पर जरा विचार करें कया वो उस मादक पदार्थ को अगर पूरे शरीर से लपेट ले तो कया वो नशा होगा , नही , कयोंकी वो पदार्थ तो केवल अपने अन्दर क्रिया करका उस आनंद को ऐक्टिवेट करता है ,अर्थात आनंद उसमें नही है हमारे अंदर ही है .
ये तो तुच्छ आनंद है जो केवल उदाहरण के लिय बताया है वरना हमारे अंदर आनंद के अपार व अनंत भंडार भरे पडे हैं ..आवश्यकता है अपने भीतर मुडकर परमात्मा तत्व की खोज करने की अगर ये मिल गया तो समझो आनंद activet हो जायगा व अन्नत आनंद अन्नत काल के लिय मिल जायगा जिसके लिय तुम किसी भी भोग विलास के आनंद को मल की भांती त्याग दोगे..तो अन्नत आनंद के लिय अंतर्मुख होकर परमात्मा की खोज करनी होगी..और कोइ अन्य उपाय है ही नही..
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प्रणाम जी

वाणी

मुखके सबद मैं बोहोत सुने, इन भी कोई दिन किया पुकार ।
पर घायल भई सो तो कोइक कुलीमें, सो रहत भवसागर पार ।।

मैंने साधु सन्तोंके मुखसे परमात्माकी प्रशंसा और वाणी वारंवार सुनी है. वे बहोत अच्छे ढंग से वाणी व परवचन करतें हैं. वे भी परमात्मा को अनेक ढंग से पुकारते हैं. परनतु अपने को भक्त व गूरू दर्शाने में ज्यादा प्रयासरत रहते है . इसकारण उनकी रहनी कूछ भिन्न हो जाती है . दूैत मे मन लगा कर अदूैत से विमुख हो रहे हैं . इसलिय ये कहा जा सकता है ही वे बाह्यरूपसे परब्रह्म परमात्माको याद करते हैं.कयोंकी परमात्मा आंतरिक विषय है. इसलिय हृदयस्पर्शी वचनोंसे घायल होनेका सदभाव इस कलियुगमें किसी भाग्यशालीको ही प्राप्त होता है. ऐसे भक्तजन इस झूठे भवसागरमें रहते हुए भी इससे परे (मायासे अलिप्त) रहते हैं.

प्रणाम जी

Thursday, January 28, 2016

हे मेरे जीव के अंतःकरण!


सुप्रभात जी

हे मेरे जीव के अंतःकरण! तूं सबसे पहल स्वयं के अस्तित्व (मैं) को पूर्णतया समाप्त कर दे ,इसके पश्चात जीव के उर्जावान रूप को आत्म स्वरूप मे लीन करके आत्मस्वरूप हो जाओ यदि तुम ऐसा कर सकते हो तो यह बात निश्चित् रूप से जान लो कि आत्मा के धाम हृदय में परमात्मा अपना आसन  जमाएं बैठे हैं। इसमें नाम मात्र के लिये भी संशय मत रखो। एक बार उस अवस्था में आने पर तो तुम्हारे लिये जीवित रहते ही मृत्यु जैसी स्थिति बन जायेगी अर्थात् तुम्हारे लिये इस शरीर और संसार का अस्तित्व नहीं रह जायेगा। यही अध्यात्म का चरम लक्ष्य है।तुम्हारे और परमात्मा के बीच एकमात्र यही एक परदा है। इसके सिवाय अन्य कोई भी बाधा नहीं है। यदि तुमने अपने अन्दर से ‘मैं’ का अस्तित्व समाप्त कर दिया तो इस झूठे संसार में ही तुझे इसी शरीर से परमधाम के सुखों की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगेगी।

प्रणाम जी

Wednesday, January 27, 2016

अखंड ग्यान को मथ के उसका सार तत्व ग्रहण करना चाहिय

सुप्रभात जी

अखंड ग्यान को मथ के उसका सार तत्व ग्रहण करना चाहिय..कयोंकी सार से ही जागर्ती आती है जीव में..इसलिय अखण्ड ज्ञान द्वारा जागृत हुआ जीव अपने मन को कर्मों की प्रवृत्ति से अलग करलेता है। इसका परिणाम यह होता है कि मन के अधीन रहने वाले अन्य अंगों (इन्द्रियों) में भी यही स्थिति बन जायेगी। जब जीव अपने साथी मन को जागृत करेगा, तब मन भी जीव की भाषा बोलने लगेगा। इस प्रकार जीव और मन एक ब्रह्मानन्द के रंग में रंग जायेंगे।ओर जीव को ब्रह्मका बोध हो जाता है , और जब जीव को ब्रह्म का बोध होता है तो विषयों में भटकने वाला मन भी इससे अछूता नहीं रहता। मन ही इन्द्रियों का राजा है। ब्रह्मानन्द की रसधारा मन को कर्म बन्धन से अलग कर देती है। उस समय जीव और मन एक ही आनन्द के रंग में डूब जाते हैं। इसलिय ब्रह्मग्यान को केवल पढने या पाठ करने से काम नही चलेगा , उसको मथके सार लेना होगा , जिस प्रकार सागर के रत्न पाने कि इच्छा लेकर अगर उपर ही तैरते रहे तो कुछ समय अवधी के बाद निश्चित ही थक कर डूब जाते है , पर जिनको पता है की रत्न सतह पर नही गहराई में हैं वे सफलता पर्वक रत्न ढ़ूंड लेते हैं...

प्रणाम जी

इन बिध खेल देखाइया..वाणी

इन बिध खेल देखाइया, ना तो रूहें झूठ देखें क्यों कर।
अपने तन हकें जान के, करी हाँसी रूहों ऊपर।।

इस प्रकार परमात्मा ने अपनी आत्माओं को माया का यह दूैत का खेल दिखाया है, अन्यथा आत्मांये इस दूैत के जगत को नहीं देख सकतीं। परमात्मा ने अपनी आत्माओं को अपना मानकर ही उनके लिय यह बिलकुल भिन्न व नये खेल की रचना की है, अर्थात् इस खेल में इस युग में जो नविनता ,वैग्यानिक उन्नती व सुलभता है वह पहले कभी कीसी युग में नही थी जो का यह खेल दिखाया है।परमात्मा ने दुैत का यह खेल अपनी आत्मांओ को सुख देने के लिये ही किया है, लेकिन इसकी वास्तविकता का ज्ञान अभी किसी को भी नहीं है। जब हम परमधाम में जागृत होंगे, तब माया का यह खेल हमें बहुत अधिक सुख देगा।
जिस प्रकार शीतल चन्द्रमा की किरणें दाहकारक नहीं हो सकती, उसी प्रकार अनन्त आनन्द के स्वरूप परमात्मा की कोई भी लीला दुःखदायी नहीं हो सकती। परमात्मा ने हमें दूैत का खेल अवश्य दिखाया है, किन्तु ब्रह्मवाणी द्वारा जो मारिफत की पहचान दी है, वह परमधाम में भी नहीं थी। अब परमधाम में या इस खेल में जागृत होने पर ही उस सुख का अहसास होगा।

प्रणाम जी