Friday, July 29, 2016

*कबीर*

में रोऊँ सब जगत को, मोको रोवे न कोय |
मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय ||
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मैं हर किसी को अदैूत के लिय कहता रहता हूं..बार बार अदूैत में आने को कहता हूं..  किन्तु मेरी अदूैत कि भाषा कोई नही समझ पा रहा है..सब दूैत मे अटके पडे हैं...मेरे लिए कोई नहीं रोता अर्थात् मेरे दर्द को कोई नहीं समझता | मेरे दर्द को वही प्राणी देख और समझ सकता है जो केवल मेरे शब्दो के फेर में ना पड़के ‘शब्द-सार’ को समझता है | अर्थात मेरे शब्दो को हृदय में बोने के बाद उससे जो सार रूपी वृक्ष लगेगा उसपे अदूैत के फल लगेंगे उन फलो से अदूैत का रस लेने से तुम माया को और बृह्म को जानकर अदूैत में स्थित हो पाओगे..
इसलिय शब्दो के सार को गृहण करो..
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प्रणाम जी

Tuesday, July 26, 2016

परमात्मा एक ही हैं.

वेद के आचार्यों के भाष्यों तथा उनके आधार पर लिए गए पाश्चात्य विद्वानों के वेदों के अनुवादों को पढने से पाठकों ने वेद जगत के कर्ता- धर्ता और नियन्ता एक परमात्मा को मानने के स्थान पर अग्नि, इन्द्र, वरुण, मित्र आदि अनेक देवी देवताओं को मानने लगे.व देवी देवताओं की पूजा का विधान बन गया..और अग्यान कि हद तब हो जाती है जब केवल एक परमात्मा को मान्ने में भय लगता है कि देवी देवता नराज होकर अनिष्ट न कर दें..  
स्वामी दयानंद ने स्पष्ट रूप से घोषणा की वेद एकेश्वरवादी हैं न की बहुदेवतावादी.
वेदों में एकेश्वरवाद के प्रमाण

१. ऋग्वेद १.१६४.४६ – उसी एक परमात्मा को इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्या, सुपर्ण, गरुत्मान, यम और मातरिश्वा आदि अनेक नामों से कहते हैं.
२. यजुर्वेद ३२.१- अग्नि, आदित्य, वायु, चंद्रमा, शुक्र, ब्रह्मा, आप: और प्रजापति- यह सब नाम उसी एक परमात्मा के हैं.

३. ऋग्वेद १०.८२.३ और अथर्ववेद २.१.३- वह परमात्मा एक हैं और सब देवों के नामों को धारण करने वाला हैं, अर्थात सब देवों के नाम उसी के हैं.

४. ऋग्वेद २.१ सूक्त में अग्नि शब्द को ज्ञानस्वरूप परमात्मा का वाचक के रूप में संबोधन करते हुए कहाँ गया हैं की हे अग्नि, तुम इन्द्र हो, तुम विष्णु हो, तुम ब्रह्मणस्पति, वरुण, मित्र, अर्यमा, त्वष्टा हो. तुम रूद्र, पूषा, सविता, भग, ऋभु , अदिति, सरस्वती,आदित्य और ब्रह्मा हो.

५. अथर्ववेद १३.४ (२), १५-२०- जो व्यक्ति इस परमात्मा देव को एक रूप में विद्यमान जनता हैं, जो की वह न दूसरा हैं, न तीसरा हैं और न चौथा हैं ऐसा जानता हैं, जोकि वह पांचवा हैं, न छठा हैं और न सांतवा हैं ऐसा जानता हैं, जोकि वह न आठवां हैं, न नवां हैं और न दसवां हैं ऐसा जानता हैं, वह सब कुछ जानता हैं. वह चेतन और अचेतन संपूर्ण रहस्य को जन लेता हैं. उसी परमात्मा देव में यह सारा जगत समाया हुआ हैं. वह देव अत्यंत सहन शक्ति वाला हैं. वह एक ही हैं, अकेला ही वर्तमान हैं, वह एक ही हैं.

इस प्रकार वेदों में अनेक प्रमाण केवल एक परमात्मा के हैं  बहुदेवतावाद का स्पष्ट खंडन है..
जो अब भी बहुदेवतावाद को मान्ता है वो वेद विरोधि है अर्थात 'धर्मविरोधी'
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प्रणाम जी

Sunday, July 24, 2016

आनन्दस्य कुलं प्राप्तं नित्येधाम्नी प्रकिर्तितम । सम्प्रदायश्चिदानन्दो निजानंदै: प्रकाशित: ।।
(श्री माहे०तं० २८)

गहनअर्थ -आत्मसाक्षातकार के द्वारा पूर्ण आनन्द परमात्मा मे सदा स्थित रहने वाले ब्रह्ममुनियों का एक मायातीत "समूह" कलयुग में जाहिर या अवतरित होगा आंतरिक दृष्टि न होने के कारण संसार के लोग भविष्य मे उन्हे केवल सम्प्रदाय मात्र मान कर उन्हे केवल निजानंद सम्प्रदाय के नाम से जानेंगे पर जो उनको पहचान कर उनके गहन व अलौकिक अदूैत ग्यान को ग्रहण करेंगे उन सभी को आत्मसाक्षात्कार होगा ..
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प्रणाम जी

Saturday, July 23, 2016


अविद्यायामंतरे वर्तमाना: स्वयंधीरा: पण्डितं मन्यमाना:।
जंघन्यमाना: परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा:।।
(मुण्डकोपनिषद् १/२/८)

व्याख्या:- जब अन्धे मनुष्य को मार्ग दिखलाने वाला भी अंधा मिल जाता है तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान पर नहीं पहुँच पाता, बीच में ही ठोकरें खाता-भटकता है, वैसे ही उन मान बडाई के लालच में गूरू बने हुये मूर्खो को भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दु:ख पूर्ण योनियों में एवं नरकादि में प्रवेश करके अनन्त जन्मों तक अनन्त यन्त्रणाओं का भोग करना पड़ता है, जो अपने आप को ही बुद्धिमान और विद्वान समझते हैं, थोडा बहोत धर्म सास्त्रो का दूैत में भाव निकाल के अर्थ का अनर्थ बना रखा है..धर्म सास्त्रो को कंठस्त करके विद्या-बुद्धि के मिथ्याभिमान में "परा विद्या" की कुछ भी परवाह न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुख रूप प्रतीत होने वाले भोग का भोग करने में तथा उनके उपार्जन में ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्य जीवन का अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते है.. और अंधकार में भटकाते हैं..

अदूैत के मार्ग के बिना माया का फन्दा नही हट सकता, बडे बडे संत गुरू भी दूैत की भक्ति करके दूैत रूपी माया में ही अटक कर विषय वासनाओ कि अग्नी में जलते रहते हैं. और जल्ती हुई वस्तु अपने सम्पर्क से दूसरो को भी जलाती है इसलिय उनके अनुयायी व उनके शिष्य भी विषय वासनाओ  घिरे रहते हैं... एकमात्र अदैत ही मार्ग है..
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प्रणाम जी

Wednesday, July 20, 2016


*मन का कार्य है आपकी सवंय की स्थिती से उत्पन्न विषय में निरंतर वृद्धि करना..*
उदाहरण-
जैसे आपके सवंय कि स्थिती वैज्ञानिक की है तो मन आपके इसी स्थिती के अनुसार आपके विषय में निरंतर वृद्धि करता रहता है, कहने का भाव है कि जहा आपकी संवय कि स्थिती होती है मन आपको उसी स्थिती के अनुसार सहायता व विषय वृद्धि करता है..
कहने का अर्थ है कि आप जहां होंगे मन वहीं होगा .. अगर आप किसी संसारी प्रेम में हो चाहे वो कोई विषय वस्तु हो या स्त्री पुरूष का प्रेम हो अर्थात आप अपनी स्थिती किसी भी प्रेम में रखें, तो आपका मन भी निरंतर वही रहेगा.. मनको विषय आप दे रहे हैं .. ध्यान दो मनको विषय आप दे रहे हैं और उलाहना मनको देते हो कि मन परमात्मा में नही लगता.. कैसे लगेगा मन वही होगा जहा आप होगे, बडे चालाक हो खुद माया से जुडे हो और मन परमात्मा जे जोडना चाहते हो ..

बहोत ही simple है खुदको परमात्मा से जोडलो मनको वही आना पडेगा और आपके परमात्मा विषय में खुद वृद्धि करता रहेगा निरंतर, ये नियम है,
इसलिय कभी भी परमात्मा में मन लगाने का व्यर्थ प्रयास मत करना, नही लगेगा, जीवन लगा दो फिर भी नही लगेगा...

*कयोंकि मन का कार्य है आपकी सवंय की स्थिती से उत्पन्न विषय में निरंतर वृद्धि करना..*

सवंय कि स्थिती परमात्मा में करलो मन लगाना नही पडेगा लगजायेगा, अपने आप...

पर ध्यान रहे विषय परमात्मा ही हो अर्थात अदूैत, जोकी 99% जीवो का नही होता 1% जीव होते हैं जो अदूैत में रहते है अन्यथा सभी दूैत में है .. और जो 99% दूैत में हैं तो उनका मन भी दूैत के विषय मे निरंतर वृद्धि करता रहता है इसलिय अदूैत उनके लिय कठिन हो जाता है...
इसलिय अदूैत को समझना परम आव्यषक है..
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प्रणाम जी


गुरू का संबंध कोई पुर्णिमा से नही है, पुर्णिमा तो महिने में एक बार आती है मासिक है, और उसमें भी अंधेरे का आधिपत्य रहता है , गुरू तो सूर्य के समान नित्य है, जिसकि उपस्थिती मात्र से निरंतर  अंतरहृदय में अग्यान रूपी अंधेरे का नाश है.....
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प्रणाम जी


दूैत को त्याग कर उदूैतमय हो जाना ही सही व एक मात्र मार्ग है , इस अदूैत के कई नाम हैं जैसे- प्रेम, सत्य या सांच, शुद्ध अनन्यता, कैवल्य आदी आदी,
इसके अलावा सब संसारी ग्यान है, दूैत का है फिर चाहे पूरा वेद कंठस्त करलो पूरी वाणी को याद करलो पर दूैत से पीछा नही छूटेगा.. गीता में इस विषय पर बहोत सपष्ट कहा है...

अध्यात्मज्ञान नित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११)

आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना अध्यात्म का आरम्भ है। उसके संरक्षण में चलते हुए परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। यही अध्यात्म की पराकाष्ठा है। इसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ है अज्ञान है...

*"सांचा साहेब सांचसो पाइये सांचको सांच है प्यारा"*
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प्रणाम जी