Tuesday, May 15, 2018

मन क्या है

क्रिया और कर्ता के बीच की स्थिती मन है.. कर्ता जब भक्ती की क्रिया करता है तो भी मन ही उत्पन्न होता है मन ही खेलता है, मन ही शून्य होकर भक्ती के सुख मे भर्मित करता है..

कर्ता याने अहं के समाप्त हुये बिना मन से छुटकारा संभव नही है..
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Monday, May 14, 2018

अहं कया है

*महत्पूर्ण प्रश्नोत्तरी...*

प्रश्न - अहं कया है ?
उत्तर - आपके अदूेत सत्य आनंद स्वरूप से अन्य जो अपना अस्तितव मान रखा है,, जिसमें परमात्मा से अलगाव महसूस हो रहा है ये अहं है |

प्रश्न - कया मन के लय होने से अहं का लय है ?
उत्तर - नही , अहं मन का जनक है, अहं से ही मन बन्ता व मिटता रहता है, मन से अंह को नियन्त्रित करना संभव नही है |

प्रश्न - अहं और अहंकार एक है या अहंकार अहं से अलग है ?
उत्तर - अहंकार अहं से अलग है , अहं मन, चित, बूद्धि व अहंकार के माध्यम से कार्य करता है , मन, चित, बूद्धि व अहंकार, अहं के हृदय के रूप में कार्य करते है, अहं इस वृक्ष का मूल है | अहं के किसी मान्यता विषेश में स्थित होने पर उस स्थिती में होने वाली बलिस्ठ गहन्ता अहंकार है |

प्रश्न - विकार कितने प्रकार के हैं ? और वो कोनसे हैं ?
उत्तर - विकार दो प्रकार के हैं, मूल विकार और उप विकार | मूल विकार "अहं" है (आपके अदूेत सत्य आनंद स्वरूप से अन्य जो अपना अस्तितव मान रखा है,, जिसमें परमात्मा से अलगाव महसूस हो रहा है ये अहं है ) और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ये उप विकार हैं |
मूल विकार के समाप्त हुये बिना उपविकार समाप्त नही हो सकते ये असम्भव है.. और हम अन्नत जन्मो से यही भूल कर रहे हैं |
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Sunday, May 13, 2018

विकार कम नही होते

प्रश्न-- मैं सारा बहोत सत्संग करता हूँ पर विकार कम नही होते । क्या सत्संग से विकार कम होते हैं ???? कृपया समाधान करें ।

उतर - तुम्हारा सत्संग ही विकार हैं । तो विकार से विकार कैसे कम होंगे । क्या अग्नि से कभी अग्नि बुझी है ।
सतसंग को विकार भाव इसलिय काहा है कयोंकी इसमें दो का भाव है सत्य और संग, अर्थात सत्य का संग करने वाला, अर्थात *अहं* | अपने को सत्य से अलग अहम मान्ते हो, यही अहं भाव सतसंग मे विकार रूप में उपस्थित रहता है.. इसलिय सवंय की शुद्ध पहचान ही सतसंग है..आनंद ही सत्य है ,आप ही आनंद हो..बाहर तो सब झूठ है.. स्वयं सत्ये हो बस संग करने वाले अहम को समाप्त होना हैं यही विकार हैं ।
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Saturday, May 12, 2018

जाग्रति या जगनी क्या है

*गुरु से नाम लिए हुए 20 साल हो गए, बताया गया था कि नाम लेने से आत्म जाग्रति हो जाती है, बोहोत नाम जाप करता हूं पर आध्यात्मिक प्रगति न के बराबर है । क्या मै सही मार्ग पर हूं या मार्ग कोई ओर है ?*

जाग्रति क्या है?
शारीरिक भाव से आत्मिक अनुभव में आना जागर्ती है.. जागनी शारीरिक बंधनो सेे निकल कर आत्मिक उन्मुक्तता में आने का नाम है..आत्मिक पहचान होना जागनी है.. जागनी से शरीर के निमित सभी बन्धन जैसे सम्प्रदायवाद, जप, स्थानवाद, चित्रवाद, आदी आदी सभी बंधन स्वतः ही छूट जाते हैं इन्हे छोडना नही पड़ता..
अगर आप इनमें बंधे है तो आप आत्म जाग्रति के आस पास भी नहीं हैं ।

जागनी कया नही है..
*पायो निजनाम आत्मा जागी* गाने से जाग्रती नही आती, हां इसके पिछे जो भाव है वो जरूर जाग्रती से सबंध रखता है...भाव यह है की पायो नित नाम अर्थात
निज= सवंय
नाम= पहचान
*सवंय की पहचान होने से आत्म जागर्ती या जागनी होती है* ( पायो निजनाम आत्मा जागी)
इसका भाव न जानने के कारण शब्दो को पकड़ कर खुद के बंधन बढ़ा लेते है...अपने को और नये नियमों में बांध लेते हैं..
निष्कर्ष यह है की हमें जागनी समझे जाने वाले सभी बंधनो को त्याग कर आत्म जाग्रती की और बढ़ना ही पड़ेगा..
जाग्रती या जागनी जीते जी मुक्त की अवस्था है
*जो अनभिज्ञ हैं कि वे अँधेरे में चल रहे हैं वे कभी प्रकाश की तलाश नहीं करेंगे।*
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Friday, May 11, 2018

छाया...

''एक छोटे से घुटने के बल चलने वाले बालक ने एक दिन सूर्य के प्रकाश में खेलते हुए अपनी परछाई देखी। उसे एक अद्भुत वस्तु जान पड़ी। क्योंकि, वह हिलता तो उसकी वह छाया भी हिलने लगती थी। वह छाया का सिर पकड़ने का प्रयास करने लगा। किंतु, जैसे ही वह छाया का सिर पकड़ने के लिए बढ़ता कि वह दूर हो जाता। वह कितना ही बढ़ता गया, लेकिन पाया कि सिर तो सदा उतना ही दूर है। उसके और छाया के बीच फासला कम नहीं होता था। थक कर और असफलता से वह रोने लगा। द्वार पर भिक्षा को आए हुए एक भिक्षु ने यह देखा। उसने पास आकर बालक का हाथ उसके सिर पर रख दिया। बालक खुश हुआ, हंसने लगा; इस भांति छाया का मस्तक भी उसने पकड़ लिया था।''
''इसी प्रकार आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का मूल है, बाकी सब इसकी छाया है, आत्मा को पकड़ना जरूरी है। जो छाया को पकड़ने में लगते हैं, वे उसे कभी भी नहीं पकड़ पाते। आत्मा के अतिरिक्त सबकुछ छाया है, झूठ है। उनके पीछे जो चलता है, वह एक दिन असफलता से रोता है।''

याद रखना कि इस जगत में स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। जो मूल खोजते हैं, वे पा लेते हैं और जो उससे अलग कुछ खोजते हैं, वे अंतत: असफलता और विषाद को ही उपलब्ध होते हैं। 

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Thursday, May 10, 2018

क्या आत्मिक आनंद संसार के प्रत्यक्ष सुख से बेहतर है

*क्या आत्मिक आनंद संसार के प्रत्यक्ष सुख से बेहतर है?*

बाहरी दृष्य में आनंद का प्रतिबिंबित होना सुख है .. अर्थात सुख का अस्तितव है ही नही, यह तो केवल आनंद का प्रतिबिंब है.. प्रतिबिंब भ्रम होता है सत्य नही.. प्रतिबिंब कभी पकड़ में नही आता इसलिय सुख भी कभी पकड़ में नही आता .. *प्रतिबिंब हमेंशा अमने सत्य स्वरूप के विपरीत दिशा में बन्ता हैं* .. इसलिय सुख भी बाहर दिखता है.. अर्थात आनंद=परमात्मा या सवंय अन्दर है , बाहर तो हर वस्तु में आपका ही प्रतिबिंब सुख बनकर आपको भ्रमित कर रहा है..
*बाहर से अंदर की और मुड जाओ, असत्य से सत्य की और चलो, प्रतिबिंब से मूल स्वरूप की और चलो, सुख से आनंद की और चलो, दूैत से अदूैत की और चलो, अपनी और चलो, सवंय को जान जाओ, तुम सवंय आनंद हो फिर प्रतिबिंब कयो पकडते हो ?
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प्रणाम जी

Wednesday, May 9, 2018

ठग से सावधान

किसी व्यक्ति का एकमात्र पुत्र गुम गया था। उसे गुमे बहुत दिन-बहुत बरस बीत गए। सब खोजबीन करके वह व्यक्ति भी थक गया। फिर धीरे-धीरे वह घटना को ही भूल गया।
तब अनेक वर्षो बाद उसके द्वार एक अजनबी आया और उसने कहा, ''मैं आपका पुत्र हूं। आप पहचाने नहीं?'' पिता प्रसन्न हुआ। उसने घर लौटे पुत्र की खुशी में मित्रों को प्रीतिभोज दिया, उत्सव मनाया और उसका स्वागत किया। लेकिन, वह तो अपने पुत्र को भूल ही गया था और इसलिए इस दावेदार को पहचान नहीं सका। वह व्यक्ति उसका पुत्र नहीं था और समय पाकर वह उसकी सारी संपत्ति लेकर भाग गया था। ऐसे ही दावेदार प्रत्येक के सामने आते हैं, लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो कि उन्हें पहचानते हों। अधिक लोग तो उनके धोखे में आ जाते हैं और अपनी जीवन रूपी संपत्ति खो बैठते हैं। आनंद ही आपका वास्तविक पुत्र है, आत्मा से उत्पन्न होने वाले वास्तविक आनंद की बजाय, जो वस्तुओं और विषयों से निकलने वाले सुख को ही आनंद समझ लेते हें, उन्हें ये उनके नकली पुत्र सारी उम्र ठगते रहते है ओर वे जीवन की अमूल्य संपदा को अपने ही हाथों नष्ट कर देते हैं।

स्मरण रखना कि जो कुछ भी बाहर से मिलता है, वह छीन भी लिया जावेगा। उसे अपना समझना भूल है। स्वयं का तो वही है, जो कि स्वयं में ही उत्पन्न होता है। वही वास्तविक संपदा है। उसे न खोजकर जो कुछ और खोजता है, वे चाहे कुछ भी पा लें, अंतत: वे पायेंगे कि उन्होंने कुछ भी नहीं पाया है और उल्टे उसे पाने की दौड़ में वे स्वयं के जीवन को ही गंवा बैठे हैं।

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