Saturday, July 7, 2018

सही ध्यान

प्रश्न - *आप कहते हो की ध्यान या चितवनी मन का खेल है..तो आत्मिक ध्यान या चितवनी कया है??*

उत्तर- ध्यान का सन्धि विछेद.. अनुभव और आनंद |
ध्यान में जो बाहर या अंदर दिख रहा है वो सब ध्यान में होने वाले अनुभव हैं..ये सब मिथ्या है..मनका खेल है..यह बाह्य विषय है..

और जो ध्यान में आनंद महसूस होता है वह आपका आन्तरिक विषय है.. यही सत्य है , यही पकड़ना है, यही ध्यान का उदेश्य है..इसी में आगे बढ़ोगे तो सवंय का ध्यान होगा यही चितवनी है..

यह भेद ना जान पाने के कारण हम ध्यान में होने वाले अनुभव को ही आनंद समझ लेते है और आत्मिक विषय से वंचित रह जाते हैं..
*आनंद को मित्थया में ही आरोपित करके मित्थया में ही आनंद ढूंडने में जन्म गवा देते है..*
केवल आनंद की और मुख रखो वही तुम हो
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Thursday, July 5, 2018

दुख निवारण

किसी ने पूछा कि जीवन दुख में घिरा है, फिर भी आप आनंद की बात कैसे करते हैं? जो है, उसे देखें तो आनंद की बात कल्पना प्रतीत होती है।
निश्चय ही जीवन दुख में घिरा है, चारों ओर दुख है; पर जो घिरा है, वह दुख नहीं है। जब तक जो घेरे हुए है, उसे देखते रहेंगे, दुख ही मालूम होगा; पर जिस क्षण उसे देखने लगेंगे, जो घिरा हुआ है, तो उसी क्षण दुख असत्य हो जाता है।
दृष्टिं परिवर्तन की बात है। जो दृष्टिं दृष्टा को प्रकट कर देती है, वही दृष्टिं है। शेष सब अंधापन है। दृष्टा के प्रकट होते ही सब आनंद हो जाता है, क्योंकि आनंद उसका स्वरूप है। जगत फिर भी रहता है, पर दूसरा हो जाता है। आत्म-अज्ञान के कारण उसमें जो कांटे मालूम हुए थे, वे अब कांटे नहीं मालूम होते हैं।
दुख की सत्ता वास्तविक नहीं है, जागने पर जैसे स्वप्न अवास्तविक हो जाता है, वैसे ही स्व-बोध पर दुख खो जाता है।

आनंद सत्य है, क्योंकि वह स्व है।

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Wednesday, July 4, 2018

आश्रय

जीवन का पथ अंधकार पूर्ण है। लेकिन स्मरण रहे कि इस अंधकार में दूसरों का प्रकाश काम नही आ सकता। प्रकाश अपना ही हो, तो ही साथी है। जो दूसरों के प्रकाश पर विश्वास कर लेते हैं, वे धोखे में पड़ जाते हैं।
एक वृद्ध ब्राह्मंण था। वह अंधा हो गया, तो उसके पुत्रों ने उसकी आंखों की शल्य चिकित्सा करनी चाही। लेकिन उसने अस्वीकार कर दिया। वह बोला, ''मुझे आंखों की क्या आवश्यकता? तुम आठ मेरे पुत्र हो,आठ कुलबधु हैं, तुम्हारी मां है, ऐसे चौंतीस आंखें मुझे प्राप्त हैं, फिर दो नहीं हें, तो क्या?'' पिता ने पुत्रों की सलाह नहीं मानी। फिर एक रात्रि अचानक घर में आग लग गई। सभी अपने-अपने प्राण लेकर भागे। वृद्ध की याद किसी को भी न रही। वह अग्नि में ही भस्म हो गया। बाहर आश्रय लेने से उनका ये परिणाम हुआ, ओर क्या हम भी उस वृद्ध की नहीं है??
इसलिए तुम स्वयं ज्ञान हो, जो बाहर का विषयनहीं है वही ज्ञान है, ज्ञान स्वयं का चक्षु है। उसके अतिरिक्त कोई शरण नहीं है।''
सत्य न तो शास्त्रों से मिल सकता है और न ही प्रवचनों से। उसे पाने का द्वार तो स्वयं में ही है। स्वयं में जो खोजते हैं, केवल वे ही उसे पाते हैं। स्वयं पर श्रद्धा ही असहाय मनुष्य का एकमात्र संबल है।
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Tuesday, July 3, 2018

सन्यास

एक संन्यासी ने कहा, 'मैं परमात्मा के लिए सब छोड़ आया हूं और अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।'
मैं देखता हूं कि सच ही उनके पास कुछ भी नहीं है, पर उनसे कहता हूं कि वह जो छोड़ना था- और जो कि छोड़ा जा सकता था- वह अब भी उनके पास है!
वह उनके भीतर है। वह उनकी आंखों में है। वह उनके त्याग में है। वह उनके संन्यास में है। वह 'मैं' है। उसे छोड़ना ही खुद को पाना है। या खुद को पाना ही उसे छोड़ना है, क्योंकि शेष सब छीना जा सकता है और अंतत: मृत्यु सब छीन ही लेती है। 'मैं' को कोई नहीं छीन सकता, उसे तो केवल छोड़ा ही जा सकता है, उसका त्याग ही केवल त्याग है।
इसलिए परमात्मा को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी परमात्मा की सेवा को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।
'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है,वही संन्यासी है।
'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।
'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं'
नहीं अपितु सबका 'मैं' है।
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Monday, July 2, 2018

परमात्मा मिलता क्यों नहीं है

* क्या सभी को परमात्मा मिल सकता है? और यदि मिल सकता है, तो फिर मिल क्यों नहीं जाता?*

 गौतम बुद्ध के पास किसी व्यक्ति ने भी यही पूछा था। उन्होंने कहा था कि जाओ और नगर में पूछकर आओ कि जीवन में कौन क्या चाहता है? वह व्यक्ति घर-घर गया और संध्या को थका-मांदा एक फेहरिस्त लेकर लौटा। कोई यश चाहता था, कोई पद चाहता था, कोई धन, वैभव, समृद्धि, पर मुक्ति का आकांक्षी तो कोई भी नहीं था! बुद्ध बोले थे कि अब बोलो, अब पूछो; परमात्मा तो प्रत्येक को मिल सकता है। वह तो है ही, पर तुम एक बार उस ओर देखो भी तो! हम तो उस ओर पीठ किये खड़े हैं।
यही उत्तर मेरा भी है। परमात्मा प्रत्येक को मिल सकता है, जैसे कि प्रत्येक बीज पौधा हो सकता है। वह हमारी संभावना है, पर संभावना को वास्तविकता में बदलना है। इतना मैं जानता हूं कि बीज को वृक्ष बनाने का यह काम कठिन नहीं है। यह बहुत ही सरल है। बीज मिटने को राजी हो जाए, तो अंकुर उसी क्षण आ जाता है। मैं मिटने को राजी हो जाऊं, तो परमात्मा उसी क्षण आ जाते है। 'मैं' बंधन है। वह गया कि आनंद है।

'मैं' के साथ मैं संसार में हूं, 'मैं' नहीं कि आनंद है

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Sunday, July 1, 2018

मुक्ति

एक युवक ने किसी साधु से पूछा था, 'मोक्ष की विधि क्या है?' उस साधु ने कहा, 'तुम्हें बांधा किसने है?' वह युवक एक क्षण रुका, फिर बोला, 'बांधा किसी ने भी नहीं है।'
तब उस साधु ने पूछा, 'फिर मुक्ति क्यों खोजते हो?'
'मुक्ति क्यों खोजते हो?' यही प्रत्येक को अपने से पूछना है। बंधन है कहां? जो है, उसके प्रति जागो। जो है, उसको बदलने की फिक्र छोड़ो। जो भविष्य में है, वह नहीं, जो वर्तमान है, वही तुम हो। और वर्तमान में कोई बंधन नहीं है। वर्तमान के प्रति जागते ही बंधन नहीं पाये जाते हैं।
कुछहोने और कुछ पाने की आकांक्षा ही बंधन है, वही तनाव है, वही दौड़ है, वही संसार है।
मोक्ष की शुरुआत अभी से करनी होती है। वह अंत नहीं, वही प्रारंभ है।
मोक्ष पाना नहीं है, वरन् दर्शन करना है कि मैं मोक्ष में ही खड़ा हूं। मैं मुक्त हूं, यह बोध शांत जाग्रत चेतना में सहज ही उपलब्ध हो जाता है। प्रत्येक मुक्त है- केवल इस सत्य के प्रति जागना मात्र है।
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Saturday, June 30, 2018

मैं परमात्मा को नहीं मानता

एक युवक ने कहा, 'मैं परमात्मा को नहीं मानता हूं, मैं स्वतंत्र हूं।' मै कहता हूं यह स्वतंत्रता नहीं पागलपन है।
क्यों है, यह पागलपन? क्योंकि अपने को अस्वीकार किए बिना परमात्मा को अस्वीकार करना असंभव है।
एक कहानी है : किसी के घर पर एक छोटा बच्चा था। वह खेलते खेलते बढ़ते-बढ़ते, आज्ञा मानते-मानते थक गया था। उसका मन परतंत्रता से ऊब गया था और फिर एक दिन उसने भी स्वतंत्र होना चाहा । वह जोर से चिल्लाया  कि सारा आकाश सुन ले, 'मैं अब बढ़ूंगा नहीं!'
'मैं अब बढ़ूंगा नहीं!'
यह विद्रोह निश्चय ही मौलिक था, क्योंकि स्वभाव के प्रति ही था। उसके पिता ने कहा, 'न बढ़ो, बढ़ने की आवश्यकता ही क्या है?' वह खुश हुआ, विद्रोह सफल हुआ था। वह न बढ़ने के श्रम में लग गया। पर बढ़ना न रुका, न रुका। वह बढ़ने में लगा रहा और बढ़ता गया और उसका पिता ये  पहले से जनता था ।

यही स्थिति है। परमात्मा या आनंद हमारा स्वभाव है। वह हमारा आंतरिक नियम है। उससे दूर नहीं जाया जा सकता है। वह हुए बिना कोई मार्ग नहीं है। कितना ही अस्वीकार करें, कितना ही स्वतंत्र होना चाहें उससे, पर उससे मुक्ति नहीं है, क्योंकि वह हमारा स्व है। वस्तुत: वह ही है और हम कल्पना हैं। इसलिए कहता हूं : उससे नहीं, उसमें, स्वयं में ही मुक्ति है।

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