Wednesday, August 15, 2018

मोक्ष क्या है

हम स्वप्न देखते हैं। जागते ही स्वप्न ओर सत्य दोनों का आभास होता है। स्वप्न में मैं हम भागीदार भी थे और द्रष्टा भी । स्वप्न में जब तक थे, द्रष्टा भूल गया था, भागीदार ही रह गया था। अब जागकर देखता हूं कि द्रष्टा ही था, भागीदार नहीं था।
स्वप्न जैसा है, संसार भी वैसा ही है। द्रष्टा, चैतन्य ही सत्य का आभास है, शेष सब कल्पित है। जिसे हमने 'मैं' जाना है, वह वास्तविक नहीं है। उसे भी जो जान रहा है, वास्तविकता की शुरुआत है।
यह सबका द्रष्टा तत्व सबसे मुक्त और सबसे अतीत है। पर इसमें भी होना है, तभी तो दृष्टा है,, इसके पार जो है इसने न कुछ किया है, न कभी कुछ हुआ है। वह बस 'है'।

असत्य 'मैं', स्वप्न 'मैं' ओर दृष्टा में शांत हो जाये, तो 'जो है', वह प्रकट हो जाता है। इस 'है' को हो जाने देना मोक्ष है, कैवल्य है।

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Sunday, August 12, 2018

आत्मा स्त्री है या पुरुष


आत्मा स्त्री है या पुरुष ??

कुछ यमय पहले पाकिस्तान से एक ब्रह्म मार्गी मित्र ने एक अत्यन्त महत्वपुर्ण प्रश्न किया था कि आत्मा स्त्री है या पुरुष ?? पर समय अभाव के कारण कुछ दिन का विलंब हो गया है जिसके लिय मैं क्षमा परार्थी हूं पर होता वही है जैसा परमात्मा का हुकुम होता है..इसलिय उनकी कृपा व हुकुम से ही यहां उत्तर देने का प्रयास किया जा रहा है कृप्या निर्विकार रूप में ग्रहण करें...
आत्मा स्त्री है या पुरुष ??

आत्मा ना स्त्री है ना पुरुष है लेकिन फिर भी आत्मा को स्त्री लिंग ही माना गाया है  कयोंकि आत्मा प्रमात्मा का अंश है और हमेशा अंशि को स्त्री लिंग के रुप मे देखा जाता है जैसे सुर्ये का अंश उसकि किरणे है तो सुर्ये को पुलिंग माना जाता है और किरणो को स्त्री लिंग इसी प्रकार सागर ओर उसकी लगहरें इसमे लहरे स्त्रीलिंग मानी गयी है कयोंकि वो अंशी है सागार की एक ओर उधाहरण लेते है जैसे वृक्ष की टहनिया , टहनियां स्त्री लिंग मानी जाती हैं  अतः हम कह सकते है की सवयं का अंग या सक्ति हमेशा स्त्री लिंग के रुप मे देखी जाती है जबकि वो वासतव मे स्त्री लिंग नही होती इसी प्रकार आत्माओं को स्त्रीलिंग के रुप मे देखा जाता है जबकी वो वासतव मे स्त्रीलिंग नही होती सत्ये तो यह है की लिंग शरीर ब्रह्मा जी की श्रिष्टि मे ही होता है कयोकी ब्रह्मा की श्रिष्टि का विस्तार माध्यम मैथुन है इसलिये लिंग शरीर की आवश्यकता होती है इस शरीर मे आशक्ति से ही विकार उतपन्न होते है याहां सबसे अहम बात यह है की हमने आज तक केवल लिंग शरीर के अलावा कोइ निर्विकार शरीर देखा नही है इसलिये हम मायातीत आतमाओ को भी अपनी विकार बुध्दि से लिंग शरीर के रुप मे ही देखते है ओर सबसे बडी गडबड तो ये है की हम जब अपने को आत्मा रुप मे ध्यान लगाते है तो खुद को स्त्रीलिंग के रुप मे ही देखते है कयोंकी ऐसा हमे सिखाया गया है जबकी सत्य तो यह है की लिंग शरीर कि कल्पना मे विकार विद्यमान रहते है ओर ऐसी मान्यता लेके हम प्रमात्मा से नही मिल सकते कयोंकी केवल ये अहम या मान्यता रूपी मूल विकार ही हमारे और प्रमात्मा के बीच का परदा है ...इसलिय सत्य की गहनता का मंथन परम आवश्यक है..
इस प्रकार के और गहन मंथन आप मेरे blog पर पा सकते है..
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प्रणाम जी

Friday, August 10, 2018

जीवन का सत्य

जीवन झाग का बुलबुला है। जो उसे ऐसा नहीं देखते, वे उसी में डूबते और नष्ट हो जाते हैं। किंतु, जो इस सत्य के प्रति सजग होते हैं, वे एक ऐसे जीवन को पा लेने का प्रारंभ करते हैं, जिसका कि कोई अंत नहीं होता है।
एक फकीर कैद कर लिया गया था। उसने कुछ ऐसी सत्य बातें कहीं थीं, जो कि बादशाह को अप्रिय लगी थीं। उस फकीर के किसी मित्र ने कैदखाने में जाकर उससे कहा, ''यह मुसीबत व्यर्थ क्यों मोल ले ली? न कही होती वे बातें, तो क्या बिगड़ता था?'' फकीर ने कहा, ''सत्य ही अब मुझ से बोला जाता है। असत्य का ख्याल ही नहीं उठता। जब से जीवन में परमात्मा का आभास मिला, तब से सत्य के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रहा है। फिर, यह कैद तो घड़ी भर की है!'' किसी ने जाकर यह बात बादशाह से कह दी। बादशाह ने कहा, ''उस पागल फकीर को कह देना कि कैद घड़ी भर की नहीं, जीवन भर की है।'' जब यह फकीर ने सुना तो खूब हंसने लगा और बोला, ''प्यारे बादशाह को कहना कि उस पागल फकीर ने पूछा है कि क्या जिंदगी घड़ी भर से ज्यादा की है?''

सत्य-जीवन जिन्हें पाना हो, उन्हें इस तथाकथित जीवन की सत्यता को जानना होगा। और, जो इसकी सत्यता को जानने का प्रयास करते हैं, वे पाते हैं कि एक स्वप्न से ज्यादा न इसकी सत्ता है और न अर्थ है। इसलिए इसे आती लघु जानकर सत्य की खोज करनी चाहिए ।

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Thursday, August 9, 2018

मैं कोन हूं

*मैं सवंय कौन हूं??*
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इस संसार आडम्बर में मैं कौन हूँ जो बोलता हूँ?? देह और यह जगत् तो मैं नहीं, यह तो असत्य उपजा है और जड़रूप पवन से स्फुरणरूप होता है सो मैं कैसे होऊँ?

यह देह भी मैं नहीं क्योंकि यह तो क्षण-क्षण में काल से लीन होता है और जड़ रूप है।

श्रवणरूपी जड़ भी मैं नहीं, क्योंकि जो शब्द सुनते हैं वह शून्य से उपजा है

त्वचा इन्द्रिय भी मैं नहीं इसका क्षण-क्षण विनाश स्वभाव है।

प्राप्त हुआ अथवा न हुआ, यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, इन्द्रियाँ आप जड़ हैं पर इनके जानने वाला चैतन्य तत्त्व है और चैतन्य के प्रमाद से ये विषय उपलब्धहोते हैं । इससे न मैं त्वचा इन्द्रिय हूँ, और न स्पर्श विषय हूँ, यह जड़ात्मक है

यह जो चच्चलरूपी तुच्छ जिह्वा इन्द्रिय है और जिसके अग्र में अल्प जल अणु स्थित है वही रस ग्रहण करता है, वह रस भी जीवसत्ता करके लब्धरूप होता है वो आप जड़ है,
इससे यह जड़रूप जिह्वा और रस मैं नहीं

ये जो विनाशरूप नेत्र दृश्य के दर्शन में लीन हैं सो मैं नहीं और न मैं इनका विषयरूप हूँ, ये जड़ हैं । यह जो नासिका पृथ्वी का अंश है सो केवल जीव के आधार है यह आप जड़ है पर इसका जाननेवाला चैतन्य है, सो न मैं नासिका हूँ, न गन्ध हूँ, मैं अहं मम से और मन के मनन से रहित शान्तरूप हूँ और ये पञ्च इन्द्रियाँ मेरे में नहीं

*मैं शुद्ध चैतन्यरूप कलना कलंक से और चित्त से रहित चिन्मात्र  निःसंकल्प निर्मल शान्तरूप हूँ ।* अब मुझको अपना स्वरूप स्मरण आता है । *प्रकाशकरूप चैतन्य अनुभव अद्वैत मेरे अनुभव से स्थित है*।
मेरी एक और *मैं* सवंय प्रकृती के साथ स्थित था जिस कारण मेरा मन अन्नत प्रयास के बाद भी अदूैैत परमात्मा में नही लग रहा था.. सदा से मैं सवंय प्रकाशकरूप चैतन्य  अद्वैत परमात्मा में स्थित हूं , अब में इस बोध से बोधित होकर *बुद्ध* हो गया हूतो मन आदी भी अब यहीं है..

इसलिय सवंयम की खोज करने से मूल तत्व का मार्ग मिलेगा..
*पेहेले आप पेहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो ।
बिना आप चीन्हें पार ब्रह्मको, कौन कहे मैं जानो।।*
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प्रणाम जी

Wednesday, August 8, 2018

दो प्रकार का वैराग्य

*वैराग्य की दो भाव दशाएँ हैं*

१. साधन वैराग्य, २. सिद्ध वैराग्य।
इन्हें यूँ भी कहा जा सकता है, १. अपर वैराग्य, २. पर वैराग्य।
इस साधन वैराग्य या अपर वैराग्य को ही वशीकार संज्ञा दी गयी है। इस का मतलब है—देखे और सुने गए विषयों के प्रति वितृष्णा। इनके प्रति भोगासक्ति का न होना। इन विषय भोगों के लिए मन में गहरी निराकांक्षा। ऐसा होना ही अपर वैराग्य है।

*सिद्ध वैराग्य यापर वैराग्य क्या है?*

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ १/१६॥
(योगदर्शन)
शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से;गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह;परम्= पर वैराग्य है। 
अर्थात् यह पर वैराग्य निराकांक्षा की अन्तिम अवस्था है- मान्यता के पुरुष के परम शुद्ध निर्विकार पुरुष के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना। (यहां दो पूरूषो का जिक्र है इनके विषय में जान्ना परम आव्यशक है ..श्वेताश्वतर उपनिषदमें भी यह बात स्पष्ट की है ।
द्वा सुपर्णा सयुजौ सखायौ, समाने वृक्षे परिषस्वजाते ।
तयोरेकं पिप्पलं स्वादुमत्तिः अनश्ननन्यो अभिचाकषीति ।।

अर्थात् एक वृक्षमें दो पक्षी सखाभावसे रहते हैं । उनमेंसे एक उस वृक्षके फलका आस्वादन करता है तो दूसरा मात्र देखता रहता ) *इसकी पूर्ण व्याख्या के लिय आप हमारी कर्ता भोक्ता भेद की post पढ. सकते हैं*

       वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। सवंय में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना सवंय में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह निर्विकार भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। 
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प्रणाम जी

Monday, August 6, 2018

मन क्या है

*मन का भेद*

अहं की उपस्थिती से उत्पन्न भाव, दशा, स्थिती, या अनुभव मन है.. ध्यान के अनुभव या भजन भक्ती में होने वाले सुख या आनंद का भास भी इसके अंतर्गत आते हैं..
प्रश्न-कया मन होता है ?
उत्तर- नही मन है ही नही, ये तो अहं का क्रिया या अक्रिया का भास है..
कया मन का लय होना होता है?
उत्तर - नही मन का कभी लय नही होता..

प्रश्न- आप कहते हो की मन है ही नही, फिर कहते हो की मनका लय नही होता, कया ये विरोधाभास नही है ??
उत्तर- अहं की उपस्थिती ही मन कहा जाता है अर्थात जो है वो अहं ही है, मन का कोई अलग अस्तितव नही है, इसलिय कहा है मन नही है |
*मनका लय नही होता* का अर्थ है की जब मन है ही नही तो लय किस का होगा, जब तक अहं है इस मन के भास के भाव का लय नही होता, लय केवल अहं का होना है, अहं के लय के साथ ही इसकी उपस्थिती से उत्पन्न भाव का भी लय हो जाता है जिसे आप मन कहते हो | अहं की उपस्थिती की क्रिया को ही मन, चित, बुद्धि, अंकार कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही मन कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही बुद्धि कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही चित कह दिया जाता है, मन, चित, बुद्धि, अंकार को ही हृदय कह दिया जाता है, परन्तु ये अहं ही है |
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Sunday, August 5, 2018

सूची

 एक दिन मैंने सूची बनाई थी- उन सब तत्वों को पाने की, जिन्हें पाकर व्यक्ति धन्यता को उपलब्ध होता है। स्वास्थ्य, सौंदर्य, सुयश, शक्ति, संपत्ति- उस सूची में सब कुछ था। उस सूची को लेकर मैं एक बुजुर्ग के पास गया और उनसे कहा कि क्या इन सब बातों में वो सब नहीं आता जो मुुुझेे चाहिए ? मेरी बातों को सुन और मेरी सूची को देख उन वृद्ध की आंखों के पास हंसी इकट्ठा होने लगी थी और वे बोले थे, ''मेरे बेटे, बड़ी सुंदर सूची है। अत्यंत विचार से तुमने इसे बनाया है। लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण बात तुम छोड़ ही गये हो, जिसके अभाव में शेष सब व्यर्थ हो जाता है।  मैंने पूछा, ''वह क्या है?'' क्योंकि मेरी दृष्टिं में तो सब-कुछ ही आ गया था। उन वृद्ध ने उत्तर में मेरी पूरी सूची को निर्ममता के साथ काट दिया और कहा कि जो तुम चाह ते हो ये वो सब नहीं है । उन सारे शब्दों की जगह उन्होंने केेेवल एक शब्द लिखा, "आनंंद"

ओर कहा, जो तुमने सूची बनाई है वो तो सब बाहर मिलने वाला सामना है, पर जो तुम चाहते हो वो तुम्हे अंदर मिलेगा, ये दोनों अलग अलग स्थान पर मिलने वाली वस्तुएं हैं, बस तुम इतनी सी बात नहीं समझ रहे हो। तुम समझते हो तुम्हारी बनाई सूची से तुम्हे आनंद मिलेगा, पर तुम ये नहीं समझ पाए कि आनंद किसी वस्तु में नहीं होता बल्कि आनंद तो अपने आप में स्वतंत्र है, वो किसी वस्तु में नहीं होता बल्कि खुद में ही होता है, इसके मार्ग वस्तुओं से अलग है ।

आनंद को चाहो, वतुओ को नहीं। लेकिन, ध्यान रहे कि उसे तुम अपने भीतर नहीं पाते हो, तो कहीं भी नहीं पा सकोगे। आनंद कोई बाह्य वस्तु नहीं है। वह तो स्वयं ही हो, ध्यान रहे कि हर परिस्थिति में भीतर संगीत बना रहे। अंतस के संगीतपूर्ण हो उठने का नाम ही आनंद है। वह कोई रिक्त और खाली मन:स्थिति नहीं है, किंतु अत्यंत सत्य संगीत की भावदशा है।

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