Wednesday, September 30, 2015

बाहर मत ढूंडो

बाहर मत ढूंडो

अरस कहिये दिल तिन का, जित है हक सहूर|
इलम इसक दोऊ हक के, दोऊ हक रोसनी नूर||

उन्ही आत्माओं का दिल वस्तुतः परमधाम कहा गया है, जहाँ पर हर पल परमात्मा का चिन्तन, उन्ही की चितवनी चलती रहेती है| वस्तुतः ज्ञान और प्रेम, दोनों ही श्री परमात्मा के तेजोमय प्रकाश स्वरुप की अमूल्य निधियाँ हैं| इसलिय जब परमात्मा को हम हृदय मे अनुभव करने लगते हैं तो ग्यान और प्रेम स्वतः ही उत्पन्न होने लगता है..

बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम् ॥७॥
(मुण्डक)

बृह्म सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है बाहर ढूंडने वालो के लिय वो दूर से भी दूर है पर जो हृदय मे धारते हैं उनके लिय वो अन्दर ही घुलमिलकर रहता है..

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मण वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८॥

(मुण्डकोपनिषद् )

परमात्मा को न तो इन आंखों से देखा जा सकता है, न वचनों को सुनने से और न ही अन्य इंद्रियों के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति संभव है। तपस्या एवं कर्मो से भी परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती।  जब उनको अंतर मे धारण करते हैं तब ज्ञान की कृपा होती है, तभी मनुष्य के अंतर में अन्य किसी प्रकार की चाह नही रह जाती तभी मनुष्य ब्रह्म का ध्यान करते हुए परमात्मा का दर्शन करता है।

प्रणाम जी

जन्मदिवस

प्रणाम जी ...आप सबके प्रेम का आभार ..साथजी इस नश्वर शरीर की गणना पर क्या उल्लास मनाना यह शरीर मिटने वाला है अर्थात अस्त्ये है और अस्त्ये तो अस्त्ये है चाहे वो किसी भी गणना का हो और गणना तो हमेशा काल की की होती है अर्थात काल ने उसे कितना खाया गणना हमेशा यही होती है और बधाई अगर जीव या आत्म को है तो जीव तो न जाने कितने शरीर बदल चूका है उसकी क्या गणना करनी और जीव अनादि है उसका कभी जन्म नही हुआ फिर उसको क्या बधाई देना और आत्मा न जन्म लेती है न मरती है वह आनंद रूपा है वह बधाई बंधन से परे है उसका उल्लास परमात्मा है काल गणना नही इसलिए साथ जी मुझे जन्मदिन की बधाई देना न तो उचित लगता है और न ही मुझे इसमें कोई उल्लास नजर आता है हम सब आत्माओं का एक मात्र उल्लास परमात्मा है हमे उसी में उल्लास व विश्राम प्राप्त होता है शरीर तो मात्र साधन है जब तक ये चल रहा है ठीक है जब रुक जायेगा तो परमात्मा में विश्राम करेंगे अगर परमात्मा का हुकुम हुआ तो ऐसे और साधन भी ग्रहण करने पड सकते है इसलिए हमारा उल्लास एक मात्र हमारा अनादि अखंड अनंत आनंद वो एक मात्र साध्ये है न की ये नश्वर साधन..इसलिय मुझे जन्मदिवस कि बधाई देना उचित नही लगता अगर मुझे बधाई देना ही चाहते है तो मेरे लिय इतना कीजीय की बाहरी आवरण से नजर हटा कर दृष्टि आत्म ह्रदय में बैठे परमात्मा की तरफ करलो अगर कर चुके तो लक्षय मिल चुका होगा और अगर नही कीया तो विलंब ना करें एक क्षण का भी कयोंकी जो क्षण बीत गया वो कभी वापस नही आयगा इसलिय क्षण क्षण सावधान रहें..
सभी साथ के चरणों मे कोटी कोटी प्रेम प्रणाम जी

Tuesday, September 29, 2015

आप दुःखी क्यों है?

सुप्रभात जी

आप दुःखी क्यों है?
तनिक स्वस्थता से विचारिये कि आप दुःखी क्यों हैं ? आपके पास धन नहीं है ? आपकी बुद्धि तीक्ष्ण नहीं है ? आपके पास व्यवहारकुशलता नहीं है ? आप रोगी हैं ? आपमें बल नहीं है ? अथवा आपमें सांसारिक ज्ञान नहीं है ? बहुतों के पास यह सब है :धनवान हैं, बलवान हैं, व्यवहारकुशल हैं, बुद्धिमान हैं, जगत का ज्ञान भी जीभ के सिरे पर है, तथापि वे दुःखी हैं । दुःखी इसलिए नहीं हैं कि उनके पास इन सब वस्तुओं अथवा वस्तुओं के ज्ञान का अभाव है । परन्तु दुःखी इसलिए हैं कि संसार का सब कुछ जानते हुए भी अपने आपको नहीं जानते । अपने आपको जान लें तो सर्व शोकों से पार हो जायें, जन्म-मरण से पार हो जायें । ... और अपने आपको न जानें तो शेष सब जाना हुआ धूल हो जाता है, क्योंकि शरीर की मृत्यु के साथ ही समस्त यहीं रह जाता है ।
    मिथ्या में सत्य को जान लेना, नश्वर में शाश्वत को खोज लेना, आत्मा को पहचान लेना तथा आत्मामय होकर जीना यही विवेक है । इसके अतिरिक्त अन्य सभी मजदूरी है, व्यर्थ बोझा उठाना और अपने आपको मूढ़ सिद्ध करने जैसा है । ऎसा विवेक धारण कर अपने आपको आध्यात्मिक मार्ग पर चला दें तो सभी कुछ उचित हो जाये, जीवन सार्थक हो जाये । अन्यथा कितने ही गद्दी-तकियों पर बैठिए, टेबल-कुर्सियों पर बैठिए, एयरकंडीशन्ड कार्यालयों में बैठकर आदेश चलाइये अथवा जनता के सम्मुख ऊँचे मंच पर बैठकर अपनी नश्वर देह और नाम की जयजयकार करवा लीजिए परंतु अंत में कुछ भी हाथ न लगेगा ।
आप जहाँ के तहाँ ही रह जायेंगे । आयु बीत जायेगी और पछतावे का पार न रहेगा । जब मौत आयेगी तब जीवन भर कमाया हुआ धन, परिश्रम करके पाये हुए पद-प्रतिष्ठा, लाड़ से पाला-पोसा यह शरीर निर्दयतापूर्वक साथ छोड़ देगा । आप खाली हाथ रोते रहेंगे, बार-बार जन्म-मरण के चक्कर में घूमते रहेंगे । इसीलिए केनोपनिषद के ऋषि कहते हैं :

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति ।
न चेदिहावेदीन महती विनष्टिः ॥

’यदि इस जीवन में ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया या परमात्मा को जान लिया, तब तो जीवन की सार्थकता है और यदि इस जीवन में परमात्मा को नहीं जाना तो महान विनाश है ।’ (केनोपनिषद : २.५)

प्रणाम जी
कह्या हक सेहेरग से नजीक, हक अरस मोमिन दिल।
ना ऊपर तले दाएं बाएं, ए बतावें मुरसद कामिल।।


कुरानमें परमात्माके लिए कहा गया है कि वे प्राणनलीसे भी अति निकट हैं. वे स्वयं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें हैं इसलिए उन्हें निकट कहा गया है.

 कुरानको पढ.नेवाले कहते हैं कि परमात्मा ऊपर, नीचे, दायेंसे बायें कही भी नहीं हैं. इसका तात्पर्य है कि वे ब्रह्मात्माओंके हृदयमें हैं..

प्रणाम जी

Monday, September 28, 2015

वाणी

रेहे ना सकों मैं रूहों बिना, रूहें रेहे ना सकें मुझ बिन।
जब पेहेचान होवे वाको, तब सहें ना बिछोहा खिन।।

मैं अपनी आत्माओं के बिना नहीं रह सकता तथा वे मेरे बिना नहीं रह सकती। जब आत्माओं को मेरे स्वरूप की पहचान हो जायेगी तो वे एक पल के लिये भी मेरा वियोग नहीं सहन कर सकती।
परमात्मा का यह कथन कि ‘मैं’ रूहों के बिना नहीं रह सकता, प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र है। इसमें मानवीय अधीरता जैसी कोई बात नहीं है। सच तो यह है कि अक्षरातीत एक पल के लिये भी अपनी आत्माओं से न कभी अलग थे, न हैं और न होंगे।

प्रणाम जी

Sunday, September 27, 2015

वास्तविक संत

सुप्रभात जी
Satsangwithparveen.blogspot.com
वास्तविक दृष्टि से देखा जाए तो शरीर मल-मूत्र बनाने की एक मशीन ही है । इसको उत्तम-से-उत्तम भोजन या भगवान् का प्रसाद खिला दो तो वह मल बनकर निकल जाएगा तथा उत्तम-से-उत्तम पेय या गंगाजल पिला दो तो वह मूत्र बनकर निकल जाएगा । जब तक प्राण हैं, तब तक तो यह शरीर मल-मूत्र बनाने की मशीन है और प्राण निकल जाने पर यह मुर्दा है, जिसको छू लेने पर स्नान करना पड़ता है । वास्तव में यह शरीर प्रतिक्षण ही मर रहा है, मुर्दा बन रहा है । इसमें जो वास्तविक तत्व (चेतन) है, उसका चित्र तो लिया ही नहीं जा सकता । चित्र लिया जाता है तो उस शरीर का, जो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है । इसलिए चित्र लेने के बाद शरीर भी वैसा नहीं रहता, जैसा चित्र लेते समय था । इसलिए चित्र की पूजा तो असत् (‘नहीं’)- की ही पूजा हुई । चित्र में चित्रित शरीर निष्प्राण रहता है, अतः हाड़-मांसमय अपवित्र शरीर का चित्र तो मुर्दे का भी मुर्दा हुआ ।

हम अपनी मान्यता से जिस पुरुष को महात्मा कहते हैं, वह अपने शरीर से सर्वदा सम्बन्ध विच्छेद हो जाने से ही महात्मा है, न कि शरीर से सम्बन्ध रहने के कारण । शरीर को तो वे मल के समान समझते हैं । अतः महात्मा के कहे जाने वाले शरीर का आदर करना, मल का आदर करना हुआ । क्या यह उचित है ?  महात्मा कहा जाने वाला शरीर पाञ्चभौतिक शरीर होने के कारण जड़ एवम् विनाशी होता है ।
यदि महात्माओं के हाड़-मांसमय शरीरों की तथा उनके चित्रों की पूजा होने लगे तो इससे पुरुषोत्तम परमात्मा की ही पूजा में बाधा पहुँचेगी, जो के सिद्धान्तों से सर्वथा विपरीत है । महात्मा तो संसार में लोगों को परमात्मा की ओर लगाने के लिए आते हैं, न कि अपनी ओर लगाने के लिए । जो लोगों को अपनी ओर (अपने ध्यान, पूजा आदि में) लगाता है, वह तो भगवद्विरोधी होता है । वास्तव में महात्मा कभी शरीर में सीमित होता ही नहीं ..

प्रणाम जी

आनंद तो शब्दातीत है

अछरातीत के मोहोल में , प्रेम इस्क बरतत ।
सो सुध अक्षर को नहीं , जो किन विध केलि करत ।।

अक्षरातीत परब्रह्म के रंगमहल में अनन्य प्रेम (इश्क) की सर्वदा ही लीला होती रहती है । अक्षरातीत अपनी प्रियाओं (आत्माओं) से किस प्रकार प्रेम की लीला करते हैं, इसकी जानकारी अक्षर ब्रह्म को भी नहीं थी ।
परमधाम भी अक्षरातीत के समान नूरमयी, मनोहारिणी व अत्यधिक प्रकाशमान है । वहाँ प्रत्येक वस्तु में चार गुण हैं- चेतनता, नूर (तेज), कोमलता और सुगन्धि । वहाँ की हर वस्तु अक्षरातीत का ही स्वरूप है, उन्हीं के समान चेतन और उनकी प्रेम की लीला में भली प्रकार सम्मिलित होती है । प्रत्येक वस्तु प्रेम और आनन्द के रस से ओत-प्रोत है ..ये केवल शब्दो में व्याख्या है वहां का आनंद तो शब्दातीत है केवल वही जान सकता है जिसे अनुभव हो चुका हो..

प्रेम प्रणाम जी