Sunday, March 18, 2018

गुरु तत्व

*कई संतो से सुना है गुरु तत्व के विषय में, कृपया इस विषय पर प्रकाश डालें ।*

सतगुरुतत्व क्या है ?

ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिरूपम्,
भावातीतं त्रिगुण रहितं सतगुरु तन्नमामि ॥
(स्कन्द्पुराणे गुरुगीतायम्)

अर्थ:= *सच्चिदानंद ब्रह्म आनन्द स्वरूप है, उसका आनंद ही प्रत्येक प्राणी में अक्रषण रूप में विद्यमान रह कर उसे आनंद की और आकर्षित करता है, यही आनंद जब आंतरिक रूप में जान लिया जाता है तो इसी को सत्गुरु य गुरुतत्व कहा जाता है।वही मूल आनंद आकर्षण सत्गुरु हैं। क्योंकि गु का अर्थ है अंधेरा या माया और रू का अर्थ है आनंद या प्रकाश,तो जो माया रूपी अंधेरे में आंतरिक आनंद रूपी प्रकाश के आकर्षण के माध्यम से हमें सत्य आनंद का बोध होता है यही माध्येम गुरूतत्वा या सतगुरु है* इसी आनंद के माध्यम तत्व को राधा या श्यामा कहा गया है।इसी कारण किसी मूलआनंदतत्वदर्शी ने कहा था राधे राधे श्याम मिला दे, राधा अर्थात उपरोक्त माध्यम व श्याम अर्थात मूल आनंद। पर अज्ञानवश लोगो ने इसे रटना शुरू कर दिया कि राधे राधे श्याम मिला दे।इस राधा तत्व से अनभिज्ञ होने के कारण लोगों ने इसे स्त्री या पुरुष बना कर देखना शुरू कर दिया।इसी के कारण राधा नाम के जाप का भ्रम पैदा हो गया।यही मूलतत्व सर्वोत्तम ज्ञान एवं परम सुख का दाता है। यह द्वंद्व अर्थात माया, निरंजन निराकार एवं साकार ब्रह्मांड से परे हैं । आकाश जैसा इसका स्वभाव है, क्योंकि ये परम शांत व अनंत्ता लिए हुए है।तत्वमसि में से असि पद ब्रह्म को कह गया है । तत पद ईश्वर से परे ब्रहं का लक्ष्य देते हैं। वह अचल रूप, सदा साक्षी स्वरूप हैं । स्वभाव अर्थात अध्यात्म अर्थात मूल अहम या अक्षरब्रह्म से भी परे हैं । तीनों गुण सत-रज-तम के स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महेश से परे हैं । ऐसे सतगुरु को सप्रेम नमस्कार है ।

ऋग्वेद 10.49.1

केवल एक परमात्मा ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वालों को सत्य ज्ञान का देने वाला है । वही ज्ञान की वृद्धि करने वाला और  धार्मिक मनुष्यों को श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त करने वाला है । वही एकमात्र इस  सारे संसार का रचयिता और नियंता है । इसलिए कभी भी उस एक परमात्मा को छोड़कर और किसी को भी धारण नहीं करनी चाहिए ..

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Friday, March 16, 2018

सही ध्यान क्या है

*सर्वविदित है कि आनंद ही ब्रह्म है, ओर ये भी सर्वविदित है कि बाह्य मार्ग से नहीं मिलेगा, तो शुरुआत कैसे करें ? मैं ध्यान करता हूं कृपया इसी मार्ग में मार्ग दर्शन करें ।*

ध्यान ही प्राथमिक ओर उचित मार्ग है, पर कभी भी मन की कल्पना का ध्यान ना करें, किसी भी व्यक्ति, स्थान या मंत्र का ध्यान न करें, किसी भी देवी देवता, परमात्मा, या आत्मा का रूप बना कर ध्यान न करें । मन से परमधाम न बनाएं, न आत्मा का रूप बनाएं न परमात्मा का । ये सब मन का खेल है ।

*तो क्या करें*

ध्यान में दो भाव होते हैं.. अनुभव और आनंद |
ध्यान में जो बाहर या अंदर दिख रहा है वो सब ध्यान में होने वाले अनुभव हैं..ये सब मिथ्या है..मनका खेल है..यह बाह्य विषय है..

और जो ध्यान में आनंद महसूस होता है वह आपका आन्तरिक विषय है.. यही सत्य है , यही पकड़ना है, यही ध्यान का उदेश्य है..इसी में आगे बढ़ोगे तो सवंय का ध्यान होगा यही चितवनी है..
ध्यान में मन से चित्र बना कर समझते हो कि समझते हो की आनंद उसी में से आ रहा है और आनंद की सही दिशा की खोज नहीं करते कभी भी ।

यह भेद ना जान पाने के कारण हम ध्यान में होने वाले अनुभव में ही आनंद को आरोपित कर लेते है और आत्मिक विषय से वंचित रह जाते हैं..
*आनंद को मित्थया में ही आरोपित करके मित्थया में ही आनंद ढूंडने में जन्म गवा देते है..*
खोज सही रखो, केवल आनंद पकडो जो तुम सदा से चाहते हो.. वो मिलेगा तभी तो खोज समाप्त होगी..
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Thursday, March 15, 2018

सत्य की बाधा

सत्य एक ही है, सबके लिए केवल वो एक ही सत्य है, इसमें कोई तेरा मेरा सत्य नहीं है। बस उस तक पहुंचने के द्वार अनेक हो सकते हैं। पर, जो द्वार के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। और सत्य के द्वार उसके लिए कभी नहीं खुलते हैं।
सत्य सब जगह है। जो भी है, सभी सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियां अनंत हैं। वह सौंदर्य की भांति है। सौंदर्य कितने रूपों में प्रकट होता है,लेकिन इससे क्या वह भिन्न-भिन्न हो जाता है! जो रात्रि तारों में झलकता है और जो फूलों में सुगंध बनकर झरता है और जो आंखों से प्रेम में प्रकट होता है- वह क्या अलग-अलग है? रूप अलग हों, पर जो उनमें स्थापित होता है, वह तो एक ही है।

*किंतु जो रूप पर रुक जाता है, वह आत्मा को नहीं जान पाता और वो सुंदर पर ठहर जाता है*,सौंदर्य तक नहीं पहुंच पाता ।

ऐसे ही, जो शब्द में बंध जाते हैं, वे सत्य से वंचित रह जाते हैं।

जो जानते हैं, वे राह के अवरोधों को सीढि़यां बना लेते हैं और जो नहीं जानते, उनके लिए सीढि़यां भी अवरोध बन जाती हैं।

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Wednesday, March 14, 2018

स्वर्ग ओर नरक क्या है?

* ''स्वर्ग और नरक क्या हैं?''*

*''हम स्वयं!''*

एक बार किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे हैं?'' उसके गुरु ने कहा, ''आंखें बंद करो और देखो।'' उसने आंखें बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरु ने कहा, ''अब स्वर्ग देखो।'' और थोड़ी देर बाद कहा, ''अब नरक!'' जब उस शिष्य ने आंखें खोली थीं, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थीं। उसके गुरु ने पूछा, ''क्या देखा?'' वह बोला, ''स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी कि लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थीं और न ही स्वर्ण के भवन थे- वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीडि़तों के रुदन। इसका कारण क्या है? क्या मैंने स्वर्ग नरक देखें या कि नहीं देखे।''

उसका गुरु हंसने लगा और बोला, ''निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखें हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रुदन तुम्हें स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो हम अपने साथ ले जाते हैं, वही वहां हमें उपलब्ध हो जाते हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।''
व्यक्ति जो अपने अंदर मान्यता में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाह्य, आंतरिक का प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग है। और, भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा है।
भीतर परमात्मा तो बाहर भी परमात्मा, *जो कण कण में परमात्मा को देखता है उसे वो कहीं नहीं मिलता ओर  जिसे अंदर परमात्मा का भास हो जाता है उसे कण कण में भी परमात्मा दिख जाता है..*
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Tuesday, March 13, 2018

वास्तविक समाधी

परमात्मा है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'आत्मा है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'मृत्यु के बाद जीवन है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'जीवन में कोई अर्थ है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'हमें ज्ञात नहीं' यह आज का पूरा जीवन है। इन तीनों शब्दों में हमारा पूरा ज्ञान समा जाता है। 'पर' के संबंध में, पदार्थ के संबंध में जानने की हमारी दौड़ का अंत नहीं है। पर 'स्व' के, चैतन्य के संबंध में हम प्रतिदिन अंधेरे में डूबते जाते हैं।
बाहर प्रकाश मालूम होता है, भीतर घुप्प अंधेरा । नहीं का ज्ञान है, है पर अज्ञान है।
और आश्चर्य यह है कि *है* प्रकाशित है फिर भी प्रकाश की खोज अंधेरे में है। "है" पर आंख भर पहुंच जाये और सब प्रकाशित हो जाता है।
'पर' आंख न हो, तो वह 'स्व' पर खुल जाती है।
बाहर उसे आधार न हो, तो वह स्व पर आधार खोज लेती है।
अंतर्मुखी चैतन्य की दृष्टि ही समाधि है।
समाधि सत्य का द्वार है। उसमें यह नहीं कि सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, वरन् सब प्रश्न लय हो जाते हैं। प्रश्नों का लय हो जाना ही असली उत्तर है। जहां प्रश्न नहीं और केवल चैतन्य है- शुद्ध चैतन्य है, वही उत्तर है, वही ज्ञान है।

इस ज्ञान को पाये बिना जीवन नहीं है केवल मृत्यु है।

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Monday, March 12, 2018

ध्यान क्या है

*ध्यान का उद्देश्य क्या है ?*

सुप्रभात जी
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ध्यान का उद्देश्य है सवंय में स्थित होना ,हम शुद्ध निर्लििप्त व निर्विकार हैं ध्यान में हम उसी अवस्था में स्थित होते हैं जो हमारा स्वभाव है .
' सवंय ' की स्थिती में दुखों का नाश छिपा हुआ है अर्थात दुखों की आत्यंतिक निवृति होना .कयोकी सवंय में स्थित होने से हमरी स्थिती प्रकृती या माया से हटती है.. प्रकृती या माया को ही दुख का मूल काहा गया है इसलिय ' सवंय ' की स्थिती में दुखों का नाश छिपा हुआ है...
सुख-दुःख मन के अंतर्गत हैं , हम सवंय , मन के परे हैं .
अतः मन की किसी क्रिया द्वारा सवंय को नहीं पाया जा सकता है.
ध्यान मन का अतिक्रमण है ,ध्यान मन से मुक्ति है ताकि मन के अतीत सवंय में स्थित हो सकें .
ध्यान मन की कोई क्रिया नहीं है ,अपितु मन की अक्रिय अवस्था को ध्यान कहते है .मन की अक्रिय जागरूक अवस्था ध्यान
है .
एकाग्रता ,पूजा -पाठ ,मंत्र जाप ,त्राटक ,चक्र व कुण्डिलिनी जागरण ये सभी ध्यान नहीं है ,ये सभी मन की क्रियाएँ हैं.
मन की क्रिया द्वारा मन का अतिक्रमण संभव नहीं है .क्योंकि प्रत्येक मन की क्रिया में मन व अहम उपस्थित रहेगा .
जब मन की कोई क्रिया नहीं है अर्थात आप कुछ नहीं कर रहे है सिर्फ जागरूक हैं ,साक्षी है ,विश्रांत हैं ,मात्र होनापन है
यह है 'ध्यान '.आप न तो एकाग्रता कर रहे है ,न मंत्र जाप कर रहे हैं ,न त्राटक,न पूजा पाठ ,न चक्र या कुण्डिलिनी जागरण
आप मात्र मन के साक्षी हैं ,दृष्टा है ,मात्र "आप हैं " -यह है ध्यान . ध्यान का आपका स्वरूप है ,

*सवंय में स्थित होने के बाद आगे का रस्ता सुलभ हो जाता है.. जिस से सत्य की प्राप्ती होती है*

इसलिय काहा है .. *पहले आप पहचानो रे साधो..*
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प्रणाम जी

Wednesday, March 7, 2018

एक व्यक्ति ने पूछा, 'यह परमात्मा या सत्य की तलाश कहीं भ्रम तो नहीं है? पहले में आशा से भरा था, पर फिर धीरे-धीरे निराश होता जा रहा हूं।'


मैंने कहा, 'आनंद की तलाश भ्रम ही है, क्योंकि परमात्मा को खोजने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह सदा ही उपस्थित है। हम ओर वो इतने समीप है जितनी कि शहद के करीब मिठास,

पर फ़र्क इतना है कि उसेदेख सके, ऐसी आंखें बंद हैं, ओर जिन आंखो से वो दिखता नहीं यूं आंखो को ओर शक्तिशाली बना रहे हैं, प्रति क्षण । इसलिए असली खोज उस दृष्टिं को खोलने की है।

'एकअंधा आदमी था। वह सूरज को खोजना चाहता था। पर वह खोज गलत थी। सूरज तो है ही, *आंखें खोजनी है* । आंखें पाते ही सूरज मिल जाता है। साधरणत: परमात्मा का खोजने वाला, सीधे परमात्मा को खोजने में लग जाता है। वह अपनी आंखों का विचार ही नहीं करता है। यह आधारभूत भूल परिणाम में निराशा लाती है। मेरा देखना विपरीत है।मैं देखता हूं कि असली प्रश्न मेरा है और मेरे परिवर्तन का है। मैं जैसा हूं, मेरी आंखें जैसी हैं, वही मेरे ज्ञान की और दर्शन की सीमा है। मैं बदलूं, मेरी आंखें बदलें, मेरी चेतना बदले, तो जो भी अदृश्य है, वह दृश्य हो जाता है। और फिर जो अभी हम देख रहे हैं, उसकी ही गहराई में परमात्मा उपलब्ध हो जाता है। संसार में ही वह उपलब्ध हो जाता है। इसलिए मैं कहता हूं : धर्म ईश्वर को पाने का नहीं, वरन् नई दृष्टिं, नई चेतना पाने का विज्ञान है। वह तो है ही, हम उसमें ही खड़े हैं, उसमें ही जी रहे हैं। पर आंखें नहीं हैं, इसलिए सूरज दिखाई नहीं देता है। *ध्यान देना सूरज को नहीं, आंखों को खोजना है*।

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