Sunday, September 30, 2018

आनंद कहां है

सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें आत्मआनंद की प्राप्ति नहीं होगी।
हमें आत्मआनंद की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है। लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा आत्मआनंद प्राप्त नहीं होगा।
चाहे हम योग की राह पर चलें या हम अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना ही बेहतर समझें, यदि हमने ये बात जान ली कि आनंद कहीं बाहर से नहीं आना, आनंद हमारे अंदर ही है, तो हमें सदैव आत्मआनंद प्राप्त होगा कयोंकी एकमात्र आत्मा व परमात्मा ही आनंद है अर्थात आप स्वयं,आनंद और बृह्म ये सब एक है...
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प्रणाम जी

Friday, September 28, 2018

मृत्यु क्या है

*मृत्यु कया है ?*

जीव मान्यता में यह खेल देख रहा है, और मान्यता खेल रही है .. वास्तव मे मान्यता है ही नही, यह बनाई गई है, जन्म व मृत्यु भी इसी की होती है कयोंकी ध्यान से देखो तो मृत्यु और जन्म कुछ है ही नही, केवल मान्यता है..

जिस मृत्यु से तुम इतना डरते हो वो होती ही नही है..
अर्थात मृत्यु किसी की नही होती, ध्यान से देखो मरा कौन.. कयोंकी तुम चेतन हो, कभी मर नही सकते, शरीर की भी मृत्यु नही होती, कयोंकी ये भी अमने मूल में लय होता है .. मरता नही अर्थात शून्य नही होता, रहता है सदा, चाहे किसी भी आकार मे रहे..
फिर मरता कौन है?
मृत्यु किसकी है ?

मृत्यु मान्यता की है.. मां,बाप,भाई,बहन,बेटा ये मरते है.. ये क्या हैं ? ये मन्यता है , ये जो तुमने मान रखा है केवल ये मानी हुई मान्यता की मृत्यु होती है.. इसी का भय है .. झूठ का भय है..

अपने सत्य स्वरूप में आ जाओ झूठी मान्यता नही रहेगी..

श्वेताश्वतर उपनिषदमें भी यह बात स्पष्ट की है । यथा,

द्वा सुपर्णा सयुजौ सखायौ, समाने वृक्षे परिषस्वजाते ।
तयोरेकं पिप्पलं स्वादुमत्तिः अनश्ननन्यो अभिचाकषीति ।।

अर्थात् एक वृक्षमें दो पक्षी सखाभावसे रहते हैं । उनमेंसे एक उस वृक्षके फलका आस्वादन करता है तो दूसरा मात्र देखता रहता है ..

*यामें जीव दोय भाँत के, एक खेल दूजे देखनहार|
पेहेचान ना होवे काहू को, आड़ी पड़ी माया मोह अहंकार||*
(कि: 30/12)
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Thursday, September 27, 2018

संसार से बंधन के कारण को समझिए

*बन्धन का कारण कया है??*

कारण शरीर ”प्रकृति” का नाम है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, इन तीनों के समुदाय का नाम प्रकृति है। ये सूक्ष्मतम कण हैं। उसी का नाम ‘कारण-शरीर’ है।
अब उस प्रकृति रूपी कारण शरीर से दूसरा जो शरीर उत्पन्न हुआ, उसका नाम ‘सूक्ष्म शरीर’ है। आपने शरीर पर सूती कुर्ता कपड़ा पहन रखा है। इसका कारण है धागा। और धागे का कारण है- रूई। रूई, धागा और कॉटन-कुर्ता ये तीन वस्तु हो गयीं। कुर्ता, धागा और रूई, तो ऐसे तीन शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पर इनमें से बंधन का जो महा कारण है वह है महाकारण शरीर ये है  महाअग्यान इसके भी पीछे छिपी है सब बंधनो की जड़ .. परमात्मा का आपके साथ जो 'वियोग' मालुम देता है कि 'परमात्मा'के साथ हमारा 'वियोग' है-ऐसा जो अनुभव होता है, वह है महा कारण , और जिसको ये वियोग अनुभव होता है वह है सब बन्धनो की जड़ ... और यह है *शुक्षम अहम* *इसको पालिया तो समझो आधा काम हो गया*.. कयोंकी इसको पाकर ही इसे समाप्त किया जा सकेगा..
*मारा कह्या काढ़ा कह्या, और कह्या हो जुदा। एही मैं खुदी टले, तब बाकी रह्या खुदा।।*

*ए मैं मैं क्यों ए मरत नहीं,और कहावत है मुरदा। आड़े नूर जमाल के, एही है परदा*

(विषय सपष्ट न होने पर सत्यसंगत का सहारा लें)
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प्रणाम जी

Wednesday, September 26, 2018

मोक्ष की विधि क्या है

एक युवक ने किसी साधु से पूछा था, 'मोक्ष की विधि क्या है?' उस साधु ने कहा, 'तुम्हें बांधा किसने है?' वह युवक एक क्षण रुका, फिर बोला, 'बांधा किसी ने भी नहीं है।'


तब उस साधु ने पूछा, 'फिर मुक्ति क्यों खोजते हो?'


'मुक्ति क्यों खोजते हो?' यही प्रत्येक को अपने से पूछना है। बंधन है कहां? जो है, उसके प्रति जागो। जो है, उसको बदलने की फिक्र छोड़ो। जो भविष्य में है, वह नहीं, जो वर्तमान है, वही तुम हो। और वर्तमान में कोई बंधन नहीं है। वर्तमान के प्रति जागते ही बंधन नहीं पाये जाते हैं।


कुछहोने और कुछ पाने की आकांक्षा ही बंधन है, वही तनाव है, वही दौड़ है, वही संसार है। 

मोक्ष की शुरुआत अभी से करनी होती है। वह अंत नहीं, वही प्रारंभ है।


मोक्ष पाना नहीं है, वरन् दर्शन करना है कि मैं मोक्ष में ही खड़ा हूं। मैं मुक्त हूं, यह बोध शांत जाग्रत चेतना में सहज ही उपलब्ध हो जाता है। प्रत्येक मुक्त है- केवल इस सत्य के प्रति जागना मात्र है।


मैं जैसे ही दौड़ छोड़ता हूं- कुछ होने की दौड़ जैसे ही जाती है कि मैं हो आता हूं और 'हो आना' - पूरे अर्थो में हो आना ही मुक्ति है।


तथाकथित धार्मिक इस 'हो आने' को नहीं पाता है, क्योंकि वह दौड़ में है- मोक्ष पाने की, आत्मा को पाने की, ईश्वर को पाने की। और जो दौड़ में है, चाहे उस दौड़ का रूप कुछ भी क्यों न हो, वह अपने में नहीं है। 


धार्मिकहोना आस्था की बात नहीं, किसी प्रयास की बात नहीं, किसी क्रिया की बात नहीं। धार्मिक होना तो अपने में होने की बात है। और यह मुक्ति एक क्षणमात्र में आ सकती है। यह सत्य के प्रति सजग होते ही, जागते ही कि बंधन दौड़ में है, आकांक्षा में है, आदर्श में है, अंधेरा गिर जाता है। और जो दिखता है, उसमें बंधन पाये ही नहीं जाते हैं।

सत्य एक क्षण में क्रांति कर देता है।


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Tuesday, September 25, 2018

सत्य

मनुष्य को सत्य होने से पूर्व माने हुए स्वयं को खोना पड़ता है। इस मूल्य को चुकाये बिना सत्य में कोई गति नहीं है। ये होना ही बाधा है। वही स्वयं सत्य पर पर्दा है। यह दृष्टिं ही अवरोध है- वह दृष्टिं जो कि 'मैं' के बिंदु से विश्व को देखती है। 'अहं-दृष्टिं' के अतिरिक्त उसे सत्य से और कोई भी पृथक नहीं किये है। मनुष्य का 'मैं' हो जाना ही, परमात्मा से उसका पतन है। 'मैं' की उपस्थिति में ही वह नीचे आता है और 'मैं' के खोते ही वह भागवत-सत्ता में ऊपर उठ आता है। 'मैं' होना नीचे होना है। 'न मैं' हो जाना ऊपर उठ जाना है।
किंतु, जो खोने जैसा दीखता है, वह वस्तुत: खोना नहीं-पाना है। स्वयं की, जो सत्ता खोनी है, वह सत्ता नहीं स्वप्न ही है और उसे खेकर जो सत्ता मिलती है, वही सत्य है।

बीज जब भूमि के भीतर स्वयं को बिलकुल खो देता है, तभी वह अंकुरित होता है और वृक्ष बनता है।

हमारे मोहल्ले में एक शराबी था, जब वह नशे में होता है तो वह जो है उसको भूल कर नली या कूड़े में गिरा रहता है ।होश आने पर पता चलता हैकी मैं कौन हूं, ओर गंदगी में हूं ।

हम भी ऐसे ही हैं, अहम के नशे में हम स्वयं कों भूलकर इस असत्य संसार के नली ओर कूड़े में मस्ती के साथ गिरे पड़े है ।अहम का नशा हटे तो सत्य ओर गंदगी का बोध हो ।

(अधिक से अधिक लोगों को सत्संग तक पहुंचने के लिए नीचे 👇दिए लिंक को लोगो तक पहुंचाएं 🙏🙏)

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और

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Saturday, September 22, 2018

महत्वपूर्ण

1- जिस तरह किसी दीपक को चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है ठीक उसी तरह आत्मा को जो खुद ज्ञान का स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है.

2- हमें आनंद तभी मिलता है जब हम आनंद कि तलाश नही कर रहे होते है.

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Friday, September 21, 2018

अहम को कैसे हटाएं पढ़िए इस पोस्ट में

*क्या विनम्र होकर, सबसे प्रेम करके या अन्य किसी प्रयास से अपने अहम को समाप्त कर सकते है?*

अहंकार के मार्ग अति सूक्ष्म हैं । ओढ़ी हुई विनम्रता उसकी सूक्ष्मतम गति है । ऐसी विनम्रता उसे ढकती कम- और प्रकट ज्यादा करती है । वस्तुत: न तो प्रेम को ओढ़कर अहम मिटाया जा सकता है और न ही विनम्रता के वस्त्रों से अहंकार की नग्नता ही ढकी जा सकती है । राख के नीचे जैसे अंगरे छिपे और सुरक्षित होते हैं और हवा का जरा-सा झोंका ही उन्हें प्रकट कर देता है । 

 ऐसे ही आरोपित व्यक्तित्त्वों में यथार्थ दबा रहता है । एक धीमी-सी खरोंच ही अभिनय को तोड़कर उसे प्रत्यक्ष कर देती है । ऐसी परोक्ष बीमारियां प्रत्यक्ष बीमारियों से ज्यादा ही भयंकर और घातक होती हैं, लेकिन स्वयं को ही धोखा देने में मनुष्य का कौशल बहुत विकसित है और वह उस कौशल का इतना अधिक उपयोग करता है कि वह उसका स्वभाव बन जाता है । हजारों वर्षों से जबरदस्ती अहम को दबाने के प्रयास में इस कौशल के अतिरिक्त और कुछ भी निर्मित नहीं हुआ है । अहम को मिटाने में तो नहीं, उसे ढकने में मनुष्य जरूर ही सफल हो गया है और इस भांति तथाकथित यह अहम एक महारोग सिद्ध हुआ है ।

*तो करना क्या है*

 *इसके विष्य में तुम्हे एक जबरदस्त बात बताता हूं ।*

*जब तुम बाल्टी या किसी भी अन्य पात्र से समुद्र को खाली करने का प्रयास करते हो तो समुंद्र कभी भी खाली नहीं होगा ये तो सत्य है, पर एक सत्य ओर है जिस से आप अनभिज्ञ रहते हो, वोंक्या है ? वो ये है कि आप जिस बाल्टी या पात्र से उसे खाली करने गए थे उसमें भी समुन्द आ गया है अर्थात वो भी खारा हो गया है। इसलिए जब तुम अहम को समाप्त करने का प्रयास करते हो तो अहम समाप्त नहीं होता बल्कि तुम्हारे प्रयासों में भी अहम आ जाता है, वो प्रयास है - विनम्र होना, सबसे प्रेम करना, सन्यासी होना, गुरु होना, चेला होना आदि आदि।*

तो ये समाप्त कैसे हो?

*अंधेरे को समाप्त नहीं कर सकते कभी भी, बस आप उजाला कर सकते हो। फिर अंधेरा रहेगा ही नही, अहम नहीं मिटाना बस आत्मज्ञान का उजाला करना है।*

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